‘हैप्पी न्यू इयर भाई साहब…’

मधुसूदन गौतम ‘कलम घिसाई’
कोटा(राजस्थान) 
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सुबह सुबह नव वर्ष मन गया वर्मा जी का,जब उन्होंने गुप्ता जी को बोल दिया ‘हैप्पी न्यू इयर भाई साहब।’
वर्मा जी को भी लगा होगा किधर बर्र के छत्ते में हाथ मार दिया यार। एक तो रात की खुमारी अभी उतरी नहीं थी तिस पर गुप्ता जी को हैपी न्यू इयर।
गुप्ता जी तो ऐसे चालू हो गए थे गोया बन्द का बटन ही न हो।
वर्मा जी बोले-“अरे भाई साहब हैपी न्यू इयर ही बोला,कोई गाली तो नहीं दी आपको।”
“यह गाली से कम नहीं वर्मा जी हम भारतीयों के लिये। जिन अंग्रेजों ने हम पर ज़ुल्म ढाये, उनके नववर्ष को हम मनाएं।
लानत है हम पर। क्या लगता है आपको आज से नया वर्ष आ गया। क्या मौसम बदल गया। क्या फसल कटकर घर आ गई। क्या रातरानी महक उठी। क्या हमारा पंचांग बदल गया,क्या हो गया ऐसा,……गुलाम मानसिकता और कुछ नहीं……।” गुप्ता जी बड़बड़ाये जा रहे थे।
“अरे भाई साहब,खुशियाँ मनानी है,उसके लिये बहाना तो चाहिए ना…आप भी पता नहीं क्या क्या….।” वर्मा जी ने थोड़ी नरमाहट दिखाने की कोशिश की,परन्तु जलती भट्टी में दो-चार शबनम की बूंद क्या असर डालती भला।
गुप्ता जी का पारा सातवें आसमान से पाँचवें पर ज़रूर आ गया। बोले-“वर्मा जी एक बात बताओ। आप लोग कैसे भारतीय हो,आपको वेलेंटाइन दिखता है मदनोत्सव नहीं,आपको नव वर्ष नज़र आता है,नवत्सर नहीं,अपितु मूर्ख दिवस भी तुम्हारे लिये खुशियों की सौगात लाता है। क्रिसमस का पेड़ तुम्हारे लिए तुलसी से बड़ा हो गया। जनक जननी पूजन दिवस से बड़े अब पेरेंट्स-डे हो गए। ओणम,पोंगल, होली,दीपावली,बसन्त सब आपके लिये गौण हो गए। आखिर आप लोग छद्म सिकुलेरिज़्म में कितने अंधे हो गए ना…क्या कहूँ।”
गुप्ता जी चाबी भरे गुड्डे की तरह बोले जा रहे थे,जिसमें एक जीबी की किसी ने मैमोरी कार्ड फंसा दी हो। और वर्मा जी बिचारे नख कर्तन किये जा रहे थे अपनी रसना से। क्या करते,न भागने के थे न बैठने के…शुरुआत भी तो उन्होंने ही की थी पंगे की।
इधर मुहल्ले वालों को तो जैसे वर्मा जी या गुप्ता जी से कोई लेना-देना नहीं था। बस या तो सुनकर चुपचाप निकल लिए, या खड़े होकर भागवत कथा की तरह श्रवण कर रहे थे। इतने में एक बना ने जयकारा लगाकर कथा को भंग करने की कोशिश की-जय श्री राधे वर्मा साहिब। वर्मा जी-बोले जय श्री राधे,परन्तु गुप्ता जी को तो यह भी नागवार गुज़रा। हाँ,इस बहाने वर्मा जी की शामत निकल गई थी और वो बिना अभिवादन के बना के साथ निकल लिये। गुप्ता जी पीछे से बड़बड़ाते रहे…कुछ नहीं हो सकता इस देश का…एक दिन वापस गुलाम होंगे साले…बिलकुल ही अपनी संस्कृति का बोध नहीं रह गया है….। जाने क्या-क्या…..।
उधर वर्मा जी सोच रहे थे…शायद नया वर्ष सबके लिये नहीं आता और आता भी है तो एकसाथ नहीं आता.. कुछ नहीं बदल सकता…

परिचय-मधुसूदन गौतम का स्थाई बसेरा राजस्थान के कोटा में है। आपका साहित्यिक उपनाम-कलम घिसाई है। आपकी जन्म तारीख-२७ जुलाई १९६५ एवं जन्म स्थान-अटरू है। भाषा ज्ञान-हिंदी और अंग्रेजी का रखने वाले राजस्थानवासी श्री गौतम की शिक्षा-अधिस्नातक तथा कार्यक्षेत्र-नौकरी(राजकीय सेवा) है। कलम घिसाई की लेखन विधा-गीत,कविता, लेख,ग़ज़ल एवं हाइकू आदि है। साझा संग्रह-अधूरा मुक्तक,अधूरी ग़ज़ल, साहित्यायन आदि का प्रकाशन आपके खाते में दर्ज है। कुछ अंतरतानों पर भी रचनाएँ छ्पी हैं। फेसबुक और ऑनलाइन मंचों से आपको कुछ सम्मान मिले हैं। ब्लॉग पर भी आप अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-समय का साधनामयी उपयोग करना है। प्रेरणा पुंज-हालात हैं।

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