ख़ंज़र चुभा दिया…

प्रदीपमणि तिवारी ध्रुव भोपाली
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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रुखसत जो होकर दिल में ख़ंज़र चुभा दिया।
कश्ती को पानी कम में तूने डुबा दिया।
आवारा बनकर जीना मंज़ूर है नहीं,
तू आ जा अब भी वापिस ये क्या सिला दिया।
घुट-घुट के जीते हैं हम जबसे ज़ुदा हुए,
देखे थे ख़ाब,ख़ाक़ में वो सब मिला दिया।
कसमें जो ख़ाई हमने अब भूल ही गये,
वादों को भूले अब ये ग़ुल क्या खिला दिया।
अरमां जो पाले दिल में वो ख़ाब ही रहे,
फेहरिस्त लंबी वो सब तुमने भुला दिया।
माँगी थी कैद रुखसत तुमने हमें किया,
पहले से दिल जला था फिर क्यों जला दिया॥
परिचय–प्रदीपमणि तिवारी का लेखन में उपनाम `ध्रुव भोपाली` हैl आपका कर्मस्थल और निवास भोपाल (मध्यप्रदेश)हैl आजीविका के लिए आप भोपाल स्थित मंत्रालय में सहायक के रुप में कार्यरत हैंl लेखन में सब रस के कवि-शायर-लेखक होकर हास्य व व्यंग्य पर कलम अधिक चलाते हैंl इनकी ४ पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैंl गत वर्षों में आपने अनेक अंतर्राज्यीय साहित्यिक यात्राएँ की हैं। म.प्र.व अन्य राज्य की संस्थाओं द्वारा आपको अनेक मानद सम्मान दिए जा चुके हैं। बाल साहित्यकार एवं साहित्य के क्षेत्र में चर्चित तथा आकाशवाणी व दूरदर्शन केन्द्र भोपाल से अनुबंधित कलाकार श्री तिवारी गत १२ वर्ष से एक साहित्यिक संस्था का संचालन कर रहे हैं। आप पत्र-पत्रिका के संपादन में रत होकर प्रखर मंच संचालक भी हैं।
 

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