ख़ामोशी 

बोधन राम निषाद ‘राज’ 
कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
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रहता हूँ खामोश मैं,जब भी होता उदास।
मेरा मन लगता नहीं,यार नहीं तुम पासll

कैसे कहूँ खामोश मन,सूझता नहीं मजाक।
ग़म के प्याले भी नहीं,पी लेता इतफ़ाकll

मायूस होती जिन्दगी,आ जाओ तुम साथ।
ख़ामोशी अब ना रहे,दे हाथों में हाथll

आँखों में सपने वही,छाई है दिन-रात।
आओगी तुम कब तलक,कुछ तो कर लो बातll

सूना-सूना ये जहाँ,लगता मुझको यार।
आ कोई भी दे दवा,दे दो अपना प्यारll

ख़ामोशी की जिन्दगी,अब ना मैं सह पाउँ।
गर मिल जाए साथिया,गीत ख़ुशी के गाऊँll

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