‘ज़ीरो’-दर्शकों को मोह गए बउआ

इदरीस खत्री
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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‘जीरो’ फिल्म के निर्देशक-आनंद एल रॉय,लेखक-हिमांशु शर्मा हैं तो अदाकार-शाहरुख,अनुष्का शर्मा कोहली,कैटरीना कैफ,तिग्मांशु धूलिया,अभय देओल,जावेद जाफरी, शीबा चड्डा,आर माधवन,जिशान अय्यूबी और बृजेन्द्र काला हैं। इस फिल्म की अवधि-१६४मिनट है।
संगीत-अतुल अजय ने दिया है।
बजट-१६०+३८ यानि २०० करोड़ लगभग है। स्क्रीन्स की बात की जाए तो भारत में ४५०० हैं।
फ़िल्म से पहले हम लोग आनंद रॉय,हिमांशु जोशी की जोड़ी पर चर्चा कर लेते हैं। आनंद और हिमांशु की जोड़ी शुरू से ही कमाल करती आई है,चाहे-रांझणा,तनु वेड्स मनु,तनु मनु रिटर्न्स हो। तीनों फिल्म की कहानी और निर्देशन कमाल का था। हिमांशु ने हमेशा कहानी,पटकथा बड़े सटीक अंदाज़ में दर्शकों के दिलों तक पहुँचाई है। हिमांशु की कहानी-पटकथा की एक खासियत यह होती है कि,कभी भी कलाकार आधारित नहीं होती और अंत तक आप अंत का अंदाज़ा नहीं लगा पाते। इस फ़िल्म में भी यही किया गया है।
बउआ सिंह के किरदार के लिए शाहरुख खान ने खुद को बौना दिखाकर कमाल कर दिया। आज भारतीय सिनेमा में शाहरुख से उम्दा अभिनेता खोज पाना मुश्किल होगा।


भावनात्मक दृश्यों में जितनी महीन तरीके से शाहरुख ने किरदार को प्रस्तुत किया है,उससे शाहरुख के अभिनय की गहराइयों और उड़ान को पार पाना कई बार असम्भव लगता है।
फ़िल्म के पोस्टर में अंग्रेजी अक्षर O पर एक दिव्य रोशनी दिखाई है,जो फ़िल्म में फेंटेसी का सूचक हो सकती है।
फ़िल्म में एक रोमांच है कि शाहरुख बामन अवतार रूपी है,तो यह रोमांच भी थोड़ी देर में खत्म हो जाता है। उसके बाद तो फ़िल्म साधारण त्रिकोणीय प्रेम कहानी लगने लगती है। फ़िल्म की लम्बाई,खास कर दूसरे आधे हिस्से में ज्यादा खलती है।
कहानी यह है कि ३८ वर्षीय बउआ सिंह(शाहरुख)जो बौना रह गया है,इसके लिए अपने पिता को दोषी मानता है,इसीलिए पिता को नाम से पुकारता है,लेकिन इस बौने बउआ का आत्मविश्वास गजब का है। वह यह मानता ही नहीं कि उसमें कुछ कमी है। जब उम्र शादी की हो चली तो वह मैरिज ब्यूरो से एक लड़की पसन्द करके उस लड़की आरिफा (अनुष्का शर्मा)से मिलता है,जो जिस्मानी बीमारी से जूझ रही है और व्हीलचेयर पर ज़िन्दगी गुज़ार रही है। साथ ही आरिफ़ा ‘नासा’ की एक वैज्ञानिक भी है। बउआ उससे मिलता है और आरिफा को आकर्षित करने में कुछ हद तक सफल भी हो जाता है,लेकिन यहीं बीच में बउआ का पहला प्यार फ़िल्म अदाकारा बबीता मिलती है,तो शुरू होती है त्रिकोणीय प्रेम कहानी और पोस्टर के O पर लिखी फेंटेसी।  हिमांशु और आनंद की फिल्मों का अंत खोज पाना कठिन होता है,वही यहां भी हुआ है।
अंत में बउआ किसका होगा,यह जानने के लिए फ़िल्म देखनी पड़ेगी।
संगीत में गाना ‘मेरे नाम तू’,सच में दर्शकों को मोह गया। ‘हुस्न परचम’ भी सुनने में अच्छा लगता है। इरशाद कामिल की शायरी में उर्दू के लफ्ज़ों का इस्तेमाल इतना खूबसूरत होता है कि बोल दिल में घर कर जाते हैं।
इस फिल्म की कमियां देखें तो लंबाई १६४ मिनट है। भावनात्मक दृश्यों की लंबाई फ़िल्म की पकड़ ठीली करते हैं।
इस फ़िल्म को ३ सितारे देना बेहतर है।
परिचय : इंदौर शहर के अभिनय जगत में १९९३ से सतत रंगकर्म में इदरीस खत्री सक्रिय हैं,इसलिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। परिचय यही है कि,इन्होंने लगभग १३० नाटक और १००० से ज्यादा शो में काम किया है। देअविवि के नाट्य दल को बतौर निर्देशक ११ बार राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व नाट्य निर्देशक के रूप में देने के साथ ही लगभग ३५ कार्यशालाएं,१० लघु फिल्म और ३ हिन्दी फीचर फिल्म भी इनके खाते में है। आपने एलएलएम सहित एमबीए भी किया है। आप इसी शहर में ही रहकर अभिनय अकादमी संचालित करते हैं,जहाँ प्रशिक्षण देते हैं। करीब दस साल से एक नाट्य समूह में मुम्बई,गोवा और इंदौर में अभिनय अकादमी में लगातार अभिनय प्रशिक्षण दे रहे श्री खत्री धारावाहिकों और फिल्म लेखन में सतत कार्यरत हैं। फिलहाल श्री खत्री मुम्बई के एक प्रोडक्शन हाउस में अभिनय प्रशिक्षक हैंl आप टीवी धारावाहिकों तथा फ़िल्म लेखन में सक्रिय हैंl १९ लघु फिल्मों में अभिनय कर चुके श्री खत्री का निवास इसी शहर में हैl आप वर्तमान में एक दैनिक समाचार-पत्र एवं पोर्टल में फ़िल्म सम्पादक के रूप में कार्यरत हैंl 

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