फ़िर शब्दों से मैंने खेला

अभिषेक शुक्ल
बस्ती(उत्तर प्रदेश)
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गहन उजाली पसर रही थी
बहती सरिता के तीरों पर,
श्वेत चांदनी उलझ रही थी
गुज़र रहे राहगीरों पर।

 

 

सरिता में लगते देखा फिर
चाँद-चांदनी का मेला,
अति सुंदर वह पहर रहा
फ़िर शब्दों से मैंने खेला।

 

 

मनमोहक अति वह दृश्य रहा
रजनी रति भी झलक रही,
प्रेम सहित आलिंगन हो
रजनी की भी यह ललक रही।

 

 

पल भर को ही वह पहर रहा
फ़िर बीत रही रजनी बेला,
मन से मन में था शांत रहा
फ़िर शब्दों से मैंने खेला।

 

 

सरिता लहरों पर चंचल क्रीड़ा
नभ से बरस रहा श्रृंगार,
राग मिलन सरिता से फ़िर
इस स्मृति का मन पर प्रहार।

 

 

इस पल को कर तन्हाई में
क़दम बढ़ा मैं चला अकेला,
मद्धम सरिता पर तेज़ हवा
फ़िर शब्दों से मैंने खेला।

परिचय-अभिषेक शुक्ल का जन्म १ अगस्त २००१ में बस्ती(उत्तर प्रदेश) का है। वर्तमान पता बस्ती बस्ती,उत्तर प्रदेश है। आपने  प्रारंभिक शिक्षा गाँव की ही सरकारी पाठशाला में ली,फिर हर्रैया बस्ती से १२ वीं तक और वर्तमान में चंडीगढ़ में  बी.टेक. में अध्ययनरत हैं। फिलहाल इनका कार्यक्षेत्र साहित्य साधना ही है। सामाजिक गतिविधि में तमाम गैर स्वैच्छिक संगठनों से जुड़े होने के नाते सामाजिक कार्यों में शामिल हैं। आपकी लेखन विधा-कविता,कहानी,गीत,ग़ज़ल, लेख,विचार,लघुकथा,उपन्यास, समालोचना आदि है। अब तक १७० से कविता व ५० से अधिक कहानियां लिख चुके हैं,पर प्रकाशाधीन हैं। ब्लॉग पर भी अपनी अभिव्यक्ति जाहिर करते हैं।  सामाजिक चिंतन,सामाजिक विषयों पर लिखना व प्रकृति में अटूट विश्वास रखते हैं। श्री शुक्ल की लेखनी का उद्देश्य-जनमानस को हिन्दी साहित्य का असली मतलब बताना व प्रकृति की साधना है।  आपके लिए प्रेरणा पुंज बाबूजी,चाचाजी, प्रकृति तथा मानवता की सेवा में लगा समाज का हर व्यक्ति है। इनकी विशेषज्ञता सामाजिक व प्रकृति पर लेखन में है। 

 

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