काव्यभाषा

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जीते हम डरते-डरते

जीवन सारा बीत गया फूटी गागर भरते-भरते, श्याम हो गई उजली चादर कालापन हरते-हरते। बिछे हुए शूलों की...

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हाय रे इश्क

उसकी चाहत में न जाने क्या-क्या कर बैठे, सुबह को शाम और रात को दिन समझ बैठे।   ...

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तुम भुलाना नहीं…

तुम कदम यह कभी भी उठाना नहीं, मा-पिता को कभी तुम सताना नहीं। भूख में प्यास में ध्यान...

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सुनो श्यामली

न जाने तुम कब और कैसे समाईं मुझमें, एक छोटी-सी चिंगारी की मानिंद और आज धधक रही हो,...

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गुलाब भेजा है

किसी ने चूम के खत में गुलाब भेजा है, हसीं-हसीं-सा निगाहों को खाब भेजा है। उसे पता था...

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मानव बनो

तेरे जन्म का उद्देश्य क्या, जब मूल्य न तो शेष क्या। समझो है तुझमें विशेष क्या, अवगुण अनेक...

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प्रजातंत्र

तू यूँ ही बेगार-बेकार आदमी, तेरी नहीं कोई औकात आदमी तू केवल एक उपयोगी पुतला है, जो याद...

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तुम क्यूं हो गए विदा

  काश! तेरे नयनों से,मेरे नयनों की बात कर पाती झुकी हुई बोझिल पलकों पे कुछ ख्वाब सुला...

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क्योंकि मैं एक अबला हूँ…

क्योंकि मैं एक अबला हूँ... वो अबला जिस आँगन में जन्म लूं, महका दूँ तुलसी-सा कभी बहन-बेटी,कभी माँ...

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प्रकृति

 कारी कजरी, बदरिया बरसे प्यासी धरा पे। रैन बेचारी, भटकती फिरती तारक संग। ख्वाब सुहाने, जागते तारों संग...