बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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रिश्तों का रक्षा-बंधन (रक्षाबंधन विशेष)…
आओ, इस रक्षाबंधन
एक नया संकल्प लें,
हम एक-दूसरे की रक्षा
भय से नहीं,
सम्मान से करेंगे;
बंधन से नहीं,
विश्वास से करेंगे;
अधिकार से नहीं,
स्नेह से करेंगे।
बहन जहाँ भी हो,
खुश रहे
निर्भय रहे,
अपने सपनों को जी सके।
भाई जहाँ भी हो,
सफल रहे
संवेदनशील रहे,
अपने रिश्तों की गर्माहट
कभी न खोए।
कलाई पर बँधा यह धागा,
हर वर्ष हमें यही याद दिलाए
रिश्ते समय माँगते हैं,
प्रेम माँगते हैं,
और सबसे अधिक
एक-दूसरे को समझने का,
मन माँगते हैं।
सावन की फुहारों के बीच,
जब राखी की थाली सजे
दीपक की लौ मुस्कुराए,
रोली की रेखा चमके
मिठाई की खुशबू फैले,
तब एक बार
बचपन को भी याद कर लेना।
उस आँगन को याद कर लेना,
जहाँ बिना कारण हँसी आती थी
उस कमरे को याद कर लेना,
जहाँ छोटी-छोटी बातों पर
झगड़े होते थे,
उस माँ को याद कर लेना
जो दोनों को समझाती थी,
और उस पिता को
जो दूर खड़े होकर
मुस्कुराते थे।
फिर राखी बाँधते हुए
बस इतना कहना-
“यह धागा कलाई पर रहे या न रहे,
हमारे बीच का विश्वास
कभी कम न हो
समय कितना भी बदल जाए,
दूरी कितनी भी बढ़ जाए
जीवन कितनी भी परीक्षाएँ ले,
हम एक-दूसरे के सुख-दुःख में
हमेशा साथ रहें।”
यही रक्षाबंधन का उत्सव है,
यही इसकी आत्मा है
यही इसकी सुंदरता है,
एक धागा
जो दिखाई बहुत छोटा देता है,
पर अपने भीतर
एक पूरा संसार बाँधकर रखता है।
राखी केवल कलाई पर नहीं बँधती,
राखी तो मन पर बँधती है;
और मन पर बँधा हुआ रिश्ता
समय की किसी आँधी से
टूटता नहीं॥