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दीपावली ख़ुशियों वाली

डॉ. आशा मिश्रा ‘आस’
मुंबई (महाराष्ट्र)
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दीपावली पर्व स्पर्धा विशेष ……

‘दीपावली’ का नाम सुनते हीं दीयों की क़तार, रोशनी की जगमगाहट,आतिशबाज़ियाँ,रंगीन कंदील,रंग-बिरंगे कपड़े,गुजिया,लड्डू,मिठाईयाँ,नमकीन,चकली आदि…आदि…बहुत सारी बातें चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगती हैं और चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेर जाती हैं। इस वर्ष फिर ‘दीपावली’ का पावन पर्व देश की संस्कृति का दर्शन कराने हेतु,विविधता में एकता का प्रतीक बन हम सबके जीवन में उमंग,प्रेम,अपनापन और हर्षोल्लास लेकर आ रहा है। ’दीपावली’ का त्योहार हमारी संस्कृति को संरक्षित और संवर्धित करने का संदेश देता है। हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि संस्कृति और प्रकृति के विरुद्ध किया जानेवाला प्रत्येक क़दम अपने स्वयं के लिए विनाशकारी होता है। इस बात का अनुभव हमने पिछले वर्ष २०२० में आई ‘कोविड’ महामारी से जूझने के बाद कर ही लिया है। हमारे त्योहारों की यह विशेषता रही है कि ये सामाजिक एकता के अनुपम आदर्श प्रस्तुत करते हैं। भारतीय त्योहार आधुनिकता के वातावरण में भी परिवार व समाज की परम्पराओं को जीवंत बनाए रखते हैं।
भारत में ‘दीपावली’ का बहुत ही अलग और प्रशंसनीय महत्व है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम जी के १४ वर्ष के बाद वनवास से घर लौट कर आने पर अयोध्या में उनका स्वागत नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर किया था,तब से लेकर आज तक हम यह त्योहार धार्मिक और पारंपरिक धरोहर के रूप में मनाते हैं। दीपावली अर्थात् ‘दीयों का त्योहार’ ,’प्रकाश का त्योहार’! हमारे अपनों को अपने क़रीब लाने,आपसी दूरी समाप्त करने,समाज से बुराईयों को जड़ से उखाड़ फेंकने का त्यौहार है। सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर जीवन में तमाम ख़ुशियों का संचार करना ही इसका एकमात्र और महत्वपूर्ण उद्देश्य है। बाह्य जगत को प्रकाशित करने के साथ-साथ आंतरिक रूप से प्रकाशित होने की प्रेरणा लेकर जीवन पथ को आलोकित करना हमें सिखाता है।

अब यहाँ मन में प्रश्न यह उठता है कि क्या सचमुच प्रकाश का यह पर्व हमारे जीवन को और समाज को प्रकाशित कर रहा है या नहीं…? हम सब बाहर तो प्रकाश की व्यवस्था कर देते हैं लेकिन अपने मन और हृदय को प्रकाशित करना भूलते जा रहे हैं।आंतरिक रूप से आज भी अंधेरे का हिस्सा हैं।आज समाज में जिस प्रकार की सामाजिक विषमताएँ,द्वेष,अन्याय,अपराध,अराजकता आदि पनप रहे हैं वे इसी अंधकार रूपी जीवन का हिस्सा हैं। हम सब केवल शब्दों द्वारा सामाजिक संचार माध्यम के ज़रिए शुभकामनाएँ देकर एक-दूसरे का साथ देने,पथ आलोकित करने की बात तक हीं सीमित होते जा रहे हैं। वास्तव में यदि हम हमारे मन में ज्ञान,प्यार,सम्मान और सहयोग का दीपक नहीं जला पा रहे हैं तो हमें ढोंग करने की कोई आवश्यकता नहींं है। कोई भी पर्व या त्योहार हो हमें सर्वप्रथम सृष्टि के निर्माता का स्मरण करके मान्यताओं के साथ ही अपनी परम्परा का स्मरण करना चाहिए। सच कहा जाए तो आज हम अपने तीज-त्योहारों,रीति-रिवाजों और पर्वों को उनके मूल रूप में नहीं रख पा रहे हैं,त्योहारों का रूप परिवर्तित हो चुका है।
ग्रामीण निवासी भी शहरों की कुसंस्कृति की चपेट में आकर बिजली के बल्बों की लड़ियों का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे हैं,जिससे पारंपरिक घी और तेल के मिट्टी के दीए नदारद कर दिए गए हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से घी और तेल के लाभदायक महत्व को हम नज़रंदाज़ कर रहे हैं। प्रत्येक ख़ुशी के अवसर पर पटाखे चलाने का प्रचलन बनता जा रहा है। त्योहार पर हवन-पूजन और स्तुति का चलन ग़ायब होता जा रहा है। आकर्षक योजनाओं की धूल झोंककर आम व्यक्ति को अंधा बनाने की सुनियोजित होड़ लगी है। हम भीं अपनी इसी में पावन पर्व ‘दीपावली’ का सुख तलाशते हैं।
क्या कभी हमने सोचा है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़कर जाएँगे,उन्हें क्या देंगे ? करोड़ों-अरबों के भौतिक सामानों से पटे घर, बाज़ार,करोड़ों के पटाखों के धुएँ से काला हुआ पर्यावरण,पटाखों के शोर और उनकी आग में स्वाहा हुए करोड़ों का धन और इन्हें बनाते-बनाते रोज़ी-रोटी की ख़ातिर जान गँवाने वाले सैकड़ों लोग।विचार कीजिए कि पावन,धार्मिक,सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व दर्शाने वाला ‘दीपावली’ का त्योहार कहाँ खो गया ?
‘दीपावली’ मूलतः लक्ष्मी जी का पर्व,आराधना का त्योहार है। सुख-समृद्धि,संपन्नता के आह्वान का त्योहार है। कहते हैं ‘दीपावली’ की रात लक्ष्मी जी घर आती हैं। हालाँकि प्रत्येक घर में ख़ुशी की उपलब्धता मुश्किल कार्य है। फिर भी जिन्होंने उम्मीदों का फटा-पुराना दामन बिछा रखा हो,वो आसानी से कहाँ छूटता है।
कहते हैं लक्ष्मी जी चंचला होती हैं,लक्ष्मी के पास फ़ौरन खिंची चली जाती हैं लक्ष्मी जी। जिनके पास धन-संपत्ति नहीं है,वे ख़ाली उम्मीदों का थाल सजाए इंतज़ार करते हैं कि शायद किसी दिन लक्ष्मी जी उनके ग़रीबखाने में भी तशरीफ़ ले आएँ,लेकिन शायद लक्ष्मी जी ऐसा जोखिम नहीं उठाया करतीं।आह्वान करने से लक्ष्मी जी नही आतीं,लक्ष्मी जी को लाना एक कला या हुनर है जो हर किसी में नहीं होता। जिन लोगों को चूना लगाना,बेईमानी करना, नैतिकता-ईमान-मूल्यों का धंधा करना,लालच की पराकाष्ठा को छूना,स्वार्थ,अवसर,मतलब और मौक़ापरस्ती को समझना आ गया,लक्ष्मी जी को उन्होंने पकड़ कर रख लिया।
अमीरी-ग़रीबी का फ़र्क़ मिटाना अत्यावश्यक है।धर्म-जाति और क्षेत्रवाद के दीयों में नफरत का तेल भरकर बाती की तरह इंसानों को जलाना उचित नहीं है। सपनों की चकाचौंध दिखाकर फिर ‘दीपावली’ की रात गुज़र जाती है और रह जाता है-पटाखों के शोर के बाद का सन्नाटा,आसमान तक फैला हुआ धुँआ,फ़िज़ां में घुली बारूद की गंध!! अगली सुबह से बची रह जाती है वही तेल की चिंता,महँगाई का रूदन,अपराध की ख़बरें और ज़ुल्म की इंतहा…। हम प्रार्थना करते हैं कि यह ‘दीपावली’ हम सबके जीवन में ख़ुशियों की बरसात लाए,धन-वैभव,सुख-समृद्धि की भरमार हो और विश्व में सब जन रोगमुक्त स्वस्थ जीवन अपने- अपनों के संग भयमुक्त समाज में खुलकर जी सकें।

परिचय–डॉ. आशा वीरेंद्र कुमार मिश्रा का साहित्यिक उपनाम ‘आस’ है। १९६२ में २७ फरवरी को वाराणसी में जन्म हुआ है। वर्तमान में आपका स्थाई निवास मुम्बई (महाराष्ट्र)में है। हिंदी,मराठी, अंग्रेज़ी भाषा की जानकार डॉ. मिश्रा ने एम.ए., एम.एड. सहित पीएच.-डी.(शिक्षा)की शिक्षा हासिल की है। आप सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका होकर सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत बालिका, महिला शिक्षण,स्वास्थ्य शिविर के आयोजन में सक्रियता से कार्यरत हैं। इनकी लेखन विधा-गीत, ग़ज़ल,कविता एवं लेख है। कई समाचार पत्र में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। सम्मान-पुरस्कार में आपके खाते में राष्ट्रपति पुरस्कार(२०१२),महापौर पुरस्कार(२००५-बृहन्मुम्बई महानगर पालिका) सहित शिक्षण क्षेत्र में निबंध,वक्तृत्व, गायन,वाद-विवाद आदि अनेक क्षेत्रों में विभिन्न पुरस्कार दर्ज हैं। ‘आस’ की विशेष उपलब्धि-पाठ्य पुस्तक मंडल बालभारती (पुणे) महाराष्ट्र में अभ्यास क्रम सदस्य होना है। लेखनी का उद्देश्य-अपने विचारों से लोगों को अवगत कराना,वर्तमान विषयों की जानकारी देना,कल्पना शक्ति का विकास करना है। इनके पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचंद जी हैं।
प्रेरणापुंज-स्वप्रेरित हैं,तो विशेषज्ञता-शोध कार्य की है। डॉ. मिश्रा का जीवन लक्ष्य-लोगों को सही कार्य करने के लिए प्रेरित करना,महिला शिक्षण पर विशेष बल,ज्ञानवर्धक जानकारियों का प्रसार व जिज्ञासु प्रवृत्ति को बढ़ावा देना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-‘हिंदी भाषा सहज,सरल व अपनत्व से भरी हुई भाषा है।’

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