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लघुकथा को प्रांतवाद और व्यक्तिवाद से जोड़ना इतिहास के साथ खिलवाड़

पटना (बिहार)।

लघुकथा का इतिहास लिखने वाला कौन है ? एक ईमानदार समीक्षक आलोचक या फिर खुद को महिमामंडित करने वाले, दिन-रात भाई-भतीजावाद करने वाले या आर्थिक लाभ पाने के पीछे लघुकथा के मापदंड पर डंडी मारने वाले ? दरअसल, लघुकथा को प्रांतवाद और व्यक्तिवाद से जोड़ रहे हैं आज के जो समीक्षक और आलोचक, वो इतिहास के साथ खिलवाड़ है।
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद (पटना) के तत्वावधान में कवि व कथाकार सिद्धेश्वर ने ऑनलाइन कार्यक्रम ‘तेरे मेरे दिल की बात’ में उपरोक्त उद्गार व्यक्त किए। १ घंटे की इस सजीव चर्चा में ‘लघुकथा के इतिहास लेखन में मनमानी’ के संदर्भ में उन्होंने कहा कि, डॉ. सतीशराज पुष्करणा जब तक जीवित रहे, इस लघुकथा आंदोलन में रामयतन यादव, भगवती प्रसाद द्विवेदी, सिद्धेश्वर, तारिक असलम तसनीम, पुष्पा जमुआर, डॉ. मिथिलेश कुमार मिश्रा आदि को बड़ी शिद्दत के साथ याद करते थे। यह उनके द्वारा लिखित पुस्तकों, बुलेटिन आदि में चर्चा है,
लेकिन डॉ. पुष्करणा की मृत्यु के मात्र २ वर्ष के अंदर लघुकथा के इतिहास के इन पन्नों को फाड़ कर नया पन्ना चिपकाया जाने लगा है। इसे आप क्या कहेंगे, डॉ. पुष्करणा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि या अवसरवादिता ?
परिषद की सचिव ऋचा वर्मा ने बताया कि, विचार प्रस्तुत करते हुए लेखिका इंदू उपाध्याय ने कहा कि, सिर्फ लघुकथा नहीं, बल्कि साहित्य की अन्य विधाओं के साथ भी इतिहास लिखने वालों ने ऐसा ही खिलवाड़ किया है। यह घिनौना प्रयास है।
नोएडा के विज्ञान व्रत और पटना की रेखा भारती मिश्रा ने अपने दिल के उद्गार शायरी से प्रस्तुत किए तो डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना, रजनी श्रीवास्तव, पुष्प रंजन, सपना चंद्रा सहित सुनील कुमार उपाध्याय आदि ने भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

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