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इतिहास की स्याही बहुत सौभाग्य से मिलती है-राकेश शर्मा

◾साहित्यिक पत्रिकाओं को एक परिवार बनाने के लिए साहित्य अकादमी ने कराया ‘वीणा की वाणी’ विमर्श

इंदौर (मप्र)।

‘साहित्य स्थाई पत्रकारिता है’ और ‘पत्र-पत्रिका स्थाई साहित्य हैं’। इतिहास की स्याही बहुत सौभाग्य से मिलती है और वही तथ्य दर्ज होते हैं जो सोच-समझकर पदचाप के साथ चलते हैं। एक समय था जब मनुष्य के जीवन में मशीनों के पूर्व और बाद के साहित्य में अंतर आया था, अब ए.आई. के प्रवेश से पूर्व और बाद के साहित्य में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। यह एक विकट समय है, क्योंकि जब तक कविता हाथ से लिखी जाती थी, उसमें प्राण थे, लेकिन ए.आई. और तकनीक की संवेदना उस गहराई तक नहीं पहुँच सकती। जो राजनीति के लिए अपना चोला बदलता है, वह एक सच्चा व्यक्ति या साहित्यकार कभी नहीं हो सकता।
मुख्य वक्ता राकेश शर्मा (संपादक ‘वीणा’) ने अपने उद्बोधन में इस बात को देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ कम्प्यूटर साइंस के सभागार में रेखांकित किया। अवसर रहा साहित्य की ऐतिहासिक नगरी इंदौर में ‘वीणा की वाणी’ शीर्षक से देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं पर केंद्रित २ दिनी गहन विमर्श कार्यक्रम का, जो साहित्य अकादमी मप्र (मप्र शासन) द्वारा आयोजित किया गया। विवि के सभागार में हुए इस कार्यक्रम ने साहित्य, पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक के अंतर्संबंधों पर नई दृष्टि साझा की।
​ कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन व सरस्वती वंदना के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में मंच पर साहित्यकार उमापति दीक्षित, विवि के कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई, राकेश शर्मा, अकादमी के निदेशक डाॅ. विकास दवे और पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली सिंह नरगुंदे उपस्थित रहे।
स्वागत उद्बोधन में डॉ. दवे ने कहा कि साहित्य जगत में अगर कार्य करना है तो समरसता की भावना लेकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि कर्नाटक की एक शोधार्थी बहन किसी गाँव में अक्षम बच्चों को संस्कृत भाषा में प्रशिक्षित करने का प्रयास कर रही थी और किस प्रकार से उस गाँव में उन्होंने जाति भ्रम को दूर कर सभी के बीच समरसता का भाव पैदा किया। इसी तरह हम इन पत्रिकाओं को एक सूत्र में बांधना चाहते हैं।
उन्होंने श्री कृष्ण बेड़ेकर का उदाहरण देते हुए लघु कलेवर की पत्रिकाओं के संकट पर भी विचार व्यक्त किए।
मुख्य वक्ता श्री शर्मा ने ‘वीणा’ पत्रिका के ऐतिहासिक महत्व पर यह भी कहा कि ‘वीणा’ जैसी पत्रिकाएँ सत्य को आगे बढ़ाने और भ्रम को ध्वस्त करने का माध्यम हैं।
​विमर्श के दौरान उमापति दीक्षित ने शिव तांडव स्त्रोत का पाठ किया। कार्यक्रम में कुलगुरु ने अपने कॉलेज के दिनों के संस्मरण साझा किए, जहाँ साहित्य और समीक्षा की जीवंत परंपरा थी। आपने भाषा की सजगता पर ध्यान इंगित किया।

​🔹 ‘समरसता और संघ’ विमोचित
साहित्य जगत की कई लब्धप्रतिष्ठ विभूतियों की उपस्थिति में उद्घाटन सत्र में डॉ. नरगुंदे द्वारा संपादित पुस्तक ‘समरसता और संघ’ का विमोचन अतिथियों ने किया। आभार डॉ. नरगुंदे ने माना। ऐसे ही कांता राय एवं सुनीता प्रकाश की लघुकथा वृत्त का भी विमोचन हुआ।

◾हिंदी भाषा के पास आकर्षण की कोई कमी नहीं
इस प्रथम सत्र के विषय ‘जो दिखता है वही बिकता है’ (कलेवर ले-आउट में रोचकता का अभाव: पठनीय को दर्शनीय भी बनाएं) पर ग्राफिक डिजाइनर मनोज राठौर, प्रिंट तकनीकी विशेषज्ञ हेमंत खुराना एवं ‘समावर्तन’ पत्रिका के संपादक श्रीराम दवे से रंगकर्मी संजय पटेल ने संचालक के रूप में चर्चा की। इसमें साहित्य जगत के दिग्गजों और तकनीकी विशेषज्ञों ने एक मंच पर आकर पत्रिकाओं के गिरते स्तर, बढ़ती तकनीकी सुगमता और भविष्य की चुनौतियों पर गहन मंथन किया। ​चर्चा में यह बात भी उभरकर आई कि हिंदी भाषा के पास आकर्षण की कोई कमी नहीं है, बस उसे सही प्रस्तुतिकरण की आवश्यकता है। श्री राम दवे ने संपादन को एक २४/७ चलने वाला मस्तिष्क कहा और एक संपादक की चुनौतियों को रेखांकित किया। सार यह रहा कि डिजिटल युग में मोबाइल आधारित पढ़ाई बढ़ रही है, लेकिन साहित्यिक पत्रिकाओं की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है।

◾लघु पत्रिकाएं कार्टून विधा के लिए रीढ़ की हड्डी
इस संदर्भ में द्वितीय सत्र में विषय ‘थोड़ी हँसी, थोड़ी खुशी’ पर कार्टून विधा पर प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट डॉ. देवेंद्र शर्मा से रोचक चर्चा डॉ. दवे ने करते हुए बताया कि डाॅ. देवेंद्र शर्मा की कूँची के साथ-साथ उनकी कलम भी चलती है। साहित्य और कार्टून विधा पर यह एक सार्थक संवाद हुआ, जिसमें श्रोतागण से आने वाले सवालों के जवाब भी दिए गए। लघु पत्रिकाएं और कार्टून विधा विधा पर डॉ. शर्मा ने बताया कि लघु पत्रिकाएं कार्टून विधा को और अधिक रोचक बनाने में रीढ़ की हड्डी साबित हो सकती हैं। इस संदर्भ में ‘शंकर पिल्लई’ को याद किया गया।

◾रखी सबने अपनी बात
तृतीय सत्र में संपादकों द्वारा अपने ‘पत्र-पत्रिकाओं का संक्षिप्त उल्लेख और प्रसार संख्या’ विषय पर ऐसा सत्र हुआ, जहां शहर एवं बाहर से आए संपादकों को भी अपनी बात रखने का अवसर मिला, जिनमें गोपाल माहेश्वरी, नरेंद्र दीपक, मनोज जी, संदीप ‘सृजन’ और राजेश रावल आदि रहे।

◾चित्रांकन के विभिन्न आयाम प्रदर्शित
चतुर्थ सत्र चित्रांकन विधा से सारंग क्षीरसागर एवं डॉ. नरगुंदे की उपस्थिति में ‘कला और साहित्य का संगम’ साहित्य पत्र-पत्रिकाओं में चित्रांकन का सौंदर्य’ विषय पर हुआ। मंच पर चित्रांकन विधा के विभिन्न आयामों को प्रदर्शित किया गया।
पंचम सत्र ‘अस्तित्व का संकट’ घटती प्रसार संख्या एक वैश्विक चिंता: समाधान क्या?’ विषय प्र हुआ। ईश्वर शर्मा एवं लोकेंद्र सिंह राजपूत ने चुटीले अंदाज में गंभीर से गंभीर बात को बड़ी ही सहजता से सभी के समक्ष रखा।

◾रचनाओं में मौलिकता लुप्त हो रही
कार्यक्रम में दूसरे दिन के प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता शोभा जैन के साथ मंच पर वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर, शुभदा पांडे, संपादक प्रेम जनमेजय, राहुल अवस्थी और संजीव सिन्हा रहे। शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। मुख्य विषय ‘छपास की भूख’ (प्रसिद्धि की लालसा) के कारण साहित्य के गिरते स्तर और संपादकों द्वारा अपने मूल धर्म (नैतिकता और चयन की शुचिता) से विमुख होने पर शोभा जैन ने रेखांकित किया कि आज की रचनाओं में मौलिकता लुप्त हो रही है। ‘छपास की भूख’ को एक ‘मानवीय उत्कंठा’ के साथ-साथ एक मनोवैज्ञानिक विकृति के रूप में भी देखा जाना चाहिए। ‘धर्मयुग’ और धर्मवीर भारती का उदाहरण दिया गया। उन संपादकों पर कड़ा प्रहार किया गया, जो साहित्य के स्तर को गिराकर महिलाओं के अंतरंग विषयों या सतही सामग्री को स्थान देते हैं। उन्होंने संपादकों को ‘आत्म-अवलोकन’ की सलाह दी।
प्रेम जनमेजय ने संपादन कला पर कहा कि सभी संपादकों को एक ही कतार में खड़ा करना उचित नहीं है। हर संपादक की अपनी दृष्टि और कार्यशैली होती है।
​सूर्यकांत नागर ने कहा कि बड़े से बड़े साहित्यकार भी आज ‘येन-केन-प्रकारेण’ छपने की कोशिश में रहते हैं। नए लेखकों को इस ‘छपास की भूख’ से बचना चाहिए।
राहुल अवस्थी ने स्पष्ट किया कि एक संपादक को संबंधित विधा और विषय से पूरी तरह परिचित होना चाहिए।
निदेशक डॉ. दवे ने प्रेस सेवा पोर्टल पर प्रोफाइल बनाने से लेकर आगे की कार्यवाही तक छोटी से छोटी जानकारी बिंदुवार साझा की।

◾नए की आस में हुआ विदाई पाथेय
उद्यापन सत्र में ‘निरोगधाम’ पत्रिका के संपादक अशोक कुमार पांडे, डॉ. स्वाति तिवारी, संचालक अमन व्यास एवं निदेशक डॉ. दवे उपस्थित रहे। सुश्री सोनी सुगंधा ने संपादक धर्म पर ‘नमन मेरा शत-शत नमन है’ गीत प्रस्तुत किया।
अकादमी के इस आयोजन में सबसे वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर का सम्मान किया गया। डॉ. स्वाति तिवारी ने सिहावलोकन प्रस्तुत किया। ‘निरोग धाम’ के संपादक अशोक पांडे ने पाथेय प्रदान किया। और नए शुभारंभ में विदाई पाथेय निदेशक डॉ. दवे ने दिया।