आत्मा का श्रृंगार करें
राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’धनबाद (झारखण्ड) ********************************************* आओ श्रृंगार करें,तन को अब छोड़मन पर प्रहार करें,आत्मा का श्रृंगार करें। बाहरी है तन का श्रृंगार,रहता यह क्षणभंगुरदिखेगा भले आज सुंदर ,पर स्थाई नहीं जान जरूर। काम, क्रोध, मोह, लोभ पर,विजय पाई जो संघर्ष करजिसने किया मन को सुंदर,वही सुंदरता है सत्य जग पर। दया, दान, श्रम, संस्कार लेकर,शांति, … Read more