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ओ गौरैया, लौट आओ ना…

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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‘विश्व गौरैया दिवस’ विशेष (२० मार्च)…

नन्हीं गौरैया, हर आँगन की मुस्कान थी,
तेरी चहक में ही घर की पहचान थी।

भोर हुई तो तू मीठा गीत सुनाती थी,
नींद भरी आँखों में उजियारा लाती थी।

छज्जों की ओट ही तेरा छोटा-सा घर था,
तिनका-तिनका जोड़ बना तेरा संसार था।

फुदक-फुदक कर दाना चुगती जाती थी,
नन्हीं चोंच से तू खुशियाँ बिखराती थी।

आज मगर आँगन सूना-सूना लगता है,
तेरा कोई गीत नहीं अब कोई सुनता है।

ऊँची दीवारें, कंक्रीट के जंगल, कैसा मंगल,
छीन रहे हैं तुझसे जीवन का सम्बल।

तू नहीं, तो पेड़ों की छाँव भी घटती है,
तू नहीं, तो धरती की धड़कन रुकती है।

बोलो, नन्हीं जान कहाँ अब घर बनाए ?
किस डाल पर अपने गीत सुनाए ?

आओ मिलकर नई शुरुआत करें,
धरती से फिर अच्छी-सच्ची बात करें।

आँगन में रखें हम थोड़ा दाना-पानी,
छज्जों में मिले छोटे घोंसले की कहानी।

फ़िक्र से पेड़ लगाएँ, हरियाली बढ़ाएँ,
प्रकृति का फिर से सब मिल मान बढ़ाएँ।

जब हम मिल कर यह छोटा काम करेंगे,
देखना, फिर खुशियों के दिन हमें मिलेंगे।

आँगन में फिर से चिड़िया रानी चहकेगी,
गौरैया के स्वर से फिर बगिया महकेगी।

प्यारी गौरैया नन्हें पंखों से खुशियाँ लाएगी,
सूना घर, सूनी डाली फिर से मुस्काएगी।

क्या जाता है, बस हम थोड़ा प्रेम जताएँ,
मन खुश होगा, चलो गौरैया को घर बुलाएँ॥