नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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निरख मेरे नैनों को,
तुम कहाँ छुपे रहते हो
कभी आँसू बन कर छलकते,
कभी मोती बन कर हँसते हो।
नित दिन मेरे नयनों में,
पलकों में तुम बसते हो
मैं मिलती रुबरु तुमसे,
सपनों में आकर रहते हो।
पलकों को मूंद कर,
रक्षक बन कर रहते
ये बरौनी मेरे,
तुम कहाँ छुपे रहते हो।
जब आँखें खुलती है,
मदमस्त मदहोशी-सी
मादकता छा जाती,
तुम कहाँ छुपे रहते हो।
मन मयूर मेरा मस्त हो जाए,
जैसे मधु पी कर भंवरे।
निरख मेरे नैनों में,
तुम कहाँ छुपे रहते हो॥