बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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हर पल-हर क्षण का रंग बदल जाता,
कभी स्नेह का आँचल फहरा जाता
आशा का स्पंदन कभी ठहर जाता,
बाल्यकाल गुलाबी सपनों की
लाली साथ में लेकर आता।
इंद्रधनुषी मुस्कान को
यौवन हमेशा साथ लाता,
कभी पीड़ा का धूसर रंग
भी विरह अपने में समेट लेता।
मुख पर धैर्य सजा रखती है,
अडिग विश्वास भी हमेशा होता
माँ बनकर वह पीत किरण-सी,
घर-आँगन में उजियारा होता।
त्याग, तपस्या, ममता घोलती,
जीवन की हर डोर संवरती
समय-समय पर झेली उसने,
असमानता की काली रेखा को
फिर भी अपने स्वाभिमान की,
रंगत कभी नहीं है फीकी देखा।
अबकी होली यह दे संदेश
नारी न केवल सहन करे,
अपने अधिकारों के रंग से
जीवन का वह आकाश भरे।
उसकी हँसी हो सच्ची होली,
उसका सम्मान हो हर दिन,
नारी जीवन में रंग तभी हैं,
जब हो समता, प्रेम, चिंतन॥