भागलपुर (बिहार)।
लघुकथा भारत की मिट्टी की उपज है। इसकी चर्चा अग्नि पुराण में भी है, जिसमें लघुकथानिका की चर्चा आती है। २०वीं सदी में हिंदी ने लघुकथा को अपनाया। मराठी लघुकथाकार माधव राव सप्रे ने हिंदी में पहली बार ‘टोकरी भर मिट्टी’ लघुकथा लिखी और १९३७ में प्रकाशित हुई। १९८० के दशक में पारस कुंज ने लघुकथा की अलख जगाई और लघुकथा आंदोलन चलाया। उसी का साकार रूप ‘भारत की प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ हैं। पारस कुंज भागलपुर के जयशंकर प्रसाद हैं।
संत नगर बरारी स्थित ‘बाबा श्री छोटेलाल दास जी आश्रम’ में ‘शब्दयात्रा भागलपुर’ के तत्वावधान में लायंस पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित लघुकथा संग्रह ‘भारत की प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ का लोकार्पण करते हुए बिहार अंगिका अकादमी (पटना) के निवर्तमान अध्यक्ष व प्रतिष्ठित समालोचक साहित्यकार प्रो. (डॉ.) लखनलाल सिंह ‘आरोही’ ने यह बात कही। अनेक पुस्तकों के रचयिता छोटेलाल दास की अध्यक्षता में लोकार्पित इस पुस्तक में देश-विदेश के सौ स्थापित तथा नवोदित लेखकों की ११३ लघुकथा को वरिष्ठ लघुकथाकार कवि पत्रकार पारस कुंज ने सम्पादित किया है।