ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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शिव आए पार्वती से ब्याह रचाने, संग में भूत-प्रेत बाराती बना लाए
पार्वती की तपस्या आज रंग लाई है,
उनके मुखड़े पर खुशियाँ छाई है।
अब जाकर वो शुभ घड़ी आई है,
जब उनके द्वार पर बजी शहनाई है
शिव के गले में नागों की माला,
वो तन पर ओढ़े बाघम्बर छाला।
मस्तक पर शोभे चंदा चक-मक,
जटा में विराजे गंगा कलकल
हाथ में लेकर आए हैं त्रिशूल,
डमरू देखना जाना न भूल।
त्रिनेत्र वाले शिवजी दूल्हा बने,
पार्वती जी की छवि देखते बने
मंद-मंद मुस्कान है तेरा चेहरा,
शिवजी के माथे पर बंधा सेहरा।
माता मैना देख हो गई मूर्च्छित,
शिवजी के साथ आए प्रेत-भूत
सभी बाराती मगन होकर नाचे,
अब उनके दिल में शंका जागे।
बेटी मेरी अब खुश कैसे होगी ?
जब साथ में ये डरावनी आत्मा होगी
मेरी पुत्री बहुत सुकुमारी,
नाजो और नखरे में वो पलने वाली।
कितनी ही परीक्षा ली है शिव ने,
कभी नहीं हार मानी है उसने
चाहे घर-बार त्यागा उसने,
पत्ते खाकर पानी में तपस्या की उसने।
रूप बदला नारद ने, भड़काया,
कोई भी तरीका काम नहीं आया।
तब जाकर शिवजी ने है माना,
माँ पार्वती को उनने अपनाया॥