डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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प्यारी गौरैया, हाय कहाँ गई ?
मुझे याद बहुत तुम आती हो
तेरे बिना सूना मेरा आँगन,
मेरे दिल को बहुत सताती हो।
भोर हुए तेरा मुंडेर पर चढ़ना,
चीं-चीं,चीं-चीं कलरव करना
सुबह हुई ,ये सोचकर मेरा,
अधखुले नयनों से तकना।
कभी सैर गगन की करना,
फिर किचन में शोर मचाना
आपस में तेरा लड़ते-लड़ते,
मेरे सिर से आकर टकराना।
जब मैं डन्डा लेकर आऊँ,
झट तेरा मुंडेर पर जाना
जब मैं किचन से निकलूँ,
फिर तेरा वही शोर मचाना।
कैसे तुम फुर्र-फुर्र उड़ती थी,
लुका छिपी हमसे करती थी
कभी तुम हमसे डर जाती थी,
और कभी मैं तुमसे डरती थी।
कभी थाली से चावल खाना,
कभी जा पंखे से टकराना
घर बनाने की खातिर तेरा,
रस्सियाँ, धागे, तिनके लाना।
देख-देख प्यारी-सी हरकत,
मन का वो पुलकित हो जाना
ना फिर वो, अब दिन आते हैं,
और ना फिर तुम ही आती हो।
पर तुम याद बहुत आती हो,
दिल को बहुत सताती हो।
कहाँ गए वो, अब दिन सुहाने,
कब आओगी तुम, ना जाने…॥