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दुनिया चाहती अमन

आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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युद्ध और शांति-जरूरी क्या ?…

पूरी दुनिया चाहती अमन, चैन व शांति,
लडा़ई, झगड़ा, युद्ध बिखेरता है अशांति
जो खुद को समझते बादशाह, उनमें ही भ्रांति,
स्वाभिमान हर किसी का होता जो लाए क्रांति।

हम भारत वंशी जहाँ बुद्ध, जैन, गाँधी का पैग़ाम है शांति,
न युद्ध न जंग, न कोई दबाव लक्ष्य एक भारत में शांति
विश्व का कल्याण हो, प्राणियों में सद्भावना हो शांति,
धर्म की जय, अधर्म का नाश हो, तभी सुख, समृद्धि व शांति।

युद्ध विनाश, वैश्विक सम्पदा का सर्वनाश लाता अशांति,
दूसरे देश पर हमला, छोटे देशों पर कब्जा, मन चढ़ी अशांति
न स्वयं ही अजेय हो, न दूसरों को भय हो फिर क्यों है अशांति ?
विकृत हैं मन तेरे, चाहत तेरी स्वयं-भू, चिंतन तेरी अशांति।

कह रहा इतिहास अब, भूगोल में ये दुनिया,
मिटा दिया भूगोल तो उपहास ही ये दुनिया
जियो-जीने दो कहाँ अब, परिहास में ये दुनिया ?
परमाणु की ताकत बता हुई ढीठ अब ये दुनिया।

बात वैश्विक की सुनो प्रदूषण से जूझती ये दुनिया,
पर्यावरण संरक्षण की बात गौड़, अब युद्ध में ये दुनिया
वायु, जल व थल कहें कूदी हर जंग में अब दुनिया,
विनाश काल के विपरीत बुद्धि में घुस गई है दुनिया।

ज़िंदगी और मौत के, चौराहे खड़ी ये दुनिया,
अहम् व वहम को ले चल पड़ी ये दुनिया
बस तीन के इस युद्ध में थर्रा गई है दुनिया,
मित्रता है टूटती, शत्रुता में लुटती ये दुनिया।

जहाँ पल रही है शांति, है विकास की वो क्रांति,
विध्वंस पर जो हैं तुले, है उनके ही घर अशांति।
कारण उनके ही पेट्रोल, डीजल, गैस की अशांति,
घोषित करें ‘ट्रम्प’ आतंकवादी, दुश्मन बड़ा वो शांति॥