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फिर लौटकर नहीं आते

कल्याण सिंह राजपूत ‘केसर’
देवास (मध्यप्रदेश)
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फिर नहीं बसते वो बाग,
जो एक बार उजड़ जाते हैं।

लाख पुकारो वो लौटकर कभी नहीं आते,
जो एक बार चले जाते हैं।

बड़ा होता है पिता, जो खुद के
सपनों का गला घोंट कर,
हर पल औलाद के सपने सजाते हैं।

फना कर दी खुद की ज़िंदगी जिसने
औलाद को खुश रखने में,
वो हर सम्मान से तरस जाते हैं।

नैतिकता, संस्कार कहाँ बाजार में बिकते हैं,
ये कहाँ जो दौलत से खरीदे जा सकते हैं।

उसके सपने दफन हो जाते हैं,
‘केसर’ जब घर में अपने ही अपमानित कर जाते हैं॥