डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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कभी-कभी मुझे ख्याल आता है,
कि करती रहूं तुमसे बातें अभी
सुनाती रहूं दास्तां नई पुरानी,
बुनती रहूं शब्दों के जाल रुहानी।
शायद तुम भी कुछ सुनाओ,
किस्से कही-अनकही
मैं सुनती रहूं मुग्ध-सी,
बिन सोचें-क्या है गलत और सही।
यूँ ही चलती रहे हमारी,
रातभर बातों की खुमारी
तुम्हें नींद सताए तो मैं क्यों,
रातभर तुम्हें लफ्ज़ों से बैचेन करूँ ?
पवन के ठंडे झोंके जब,
मेरी पलकों को सुलाए।
तुम्हारी एक मधुर शुभ रात्रि,
झट से नींद के आग़ोश में ले जाए॥