‘मातृभाषा सप्ताह’
मुम्बई (महाराष्ट्र)।
मुम्बई (महाराष्ट्र)। विज्ञान की शिक्षा के लिए मातृभाषा माध्यम सर्वाधिक उपयुक्त है। अमेरिका के बाद सर्वाधिक नोबेल पुरस्कार जापान ने जीते हैं और वहाँ के सभी लोग मातृभाषा में ही पढ़ाई करते हैं।
मुख्य अतिथि के नाते जापान के प्रख्यात विद्वान पद्मश्री प्रो. तोमियो मिजोकामी ने यह बात कही। अवसर बना ‘मातृभाषा सप्ताह’ के समापन अवसर पर ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ तथा ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ व ‘भारतीय भाषा मंच’ द्वारा आयोजित वैश्विक आभासी संगोष्ठी ‘मातृभाषा की ओर’ का, जिसमें ऑस्ट्रेलिया के विवि में अभियांत्रिकी प्रबंधन के प्रोफ़ेसर, हिंदी शिक्षण संघ के अध्यक्ष और भारतीय भाषाओं के लिए कार्यरत प्रो. सुभाष शर्मा ने कहा कि हमें मातृभाषाओं के प्रयोग और प्रसार को बढ़ाने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क के लिए हिंदी को भी बढ़ावा देना चाहिए।
जनभाषा में न्याय के लिए संघर्षरत पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद (जो पटना उच्च न्यायालय में हिंदी में बहस करने के लिए अडिग हैं) ने कहा, कि जब आजादी की लड़ाई के लिए इतने लोगों ने बलिदान दिया है तो मातृभाषा में न्याय के लिए भी कुछ लोगों को तो सर तो कटवाना ही पड़ेगा, इसलिए मैं स्वयं आगे आ गया। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के लिए कार्यरत अन्य संस्थाओं को भी चाहिए के वे इस यज्ञ में आहुति दें।
संगोष्ठी में अमेरिका से जुड़े सूचना प्रौद्योगिकीविद् और कवि अशोक सिंह ने अपनी कविता प्रस्तुत की और मातृभाषा को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिए लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है।
ख्यात कवयित्री शैलजा सिंह ने संगोष्ठी में विषय पर अपनी बात गद्य की बजाय पद्य में रखते हुए मातृभाषा पर सुंदर गीत प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी का संचालन करते हुए वैश्विक हिंदी सम्मेलन के निदेशक डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने के साथ-साथ हमें इस दिशा में उपयुक्त उपायों पर भी विचार करना होगा।
संगोष्ठी का प्रारंभ करते हुए मंच के संयोजक डॉ. राजेश्वर कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया और मातृभाषा के प्रयोग व प्रसार के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे विभिन्न प्रयासों की भी जानकारी दी। प्रो. गीता नायक ने भी विचार प्रस्तुत किए।
(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुम्बई)