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संवेदनाओं का टूटता घरौंदा…

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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अब जीवन का हर एक पल ‘मुश्किलों’ से भरा हुआ है,
रिश्तों में ‘दूरियाँ’ बढ़ती जा रही है,
कोई किसी का नहीं होता, इस जहान में,
तभी तो सामने आ ही जाता है संवेदनाओं का टूटता घरौंदा..।

आज ‘भावात्मक’ अभिव्यक्ति शून्य ही हो गई है,
कोई किसी का नहीं;मतलबी लोग ‘ज्यादा’ नजर आते हैं
आपसी सौहार्द्र, प्रेम और भाईचारा कैसे क़ायम रहेगा,
इसलिए, संवेदनाओं का टूटता घरौंदा नजर आता है मुझे।

अड़ोस-पड़ोस में दुःख-सुख
का नहीं है कोई साथ,
शहरों की भागम-भाग में दूरियाँ बढ़ गई हैं
हर जगह अपनापन खत्म हो सा गया इस जहान में,
तभी तो संवेदनाओं का टूटता घरौंदा नजर आता है मुझे।

वो ‘घर-द्वार’, वहाँ ओटलों की अपनी चौपाल,
कहाँ चली गई, बड़े-बुजुर्गों की अपनी बात।
आज बंद कमरों में ‘ईंट-पत्थरों’ की चारदिवारी,
और मोबाइल का ही रहा साथ,
इसलिए ही संवेदनाओं का टूटता घरौंदा नजर आता है मुझे…॥