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सृजनात्मक क्षमता को ईमानदारी के साथ समाज को समर्पित करना चाहिए-सिद्धेश्वर

पटना (बिहार)।

हमारे भीतर निहित सृजनात्मक क्षमता को ईमानदारी और परिश्रम के साथ साहित्य और समाज को समर्पित करना चाहिए, ताकि वह व्यक्ति और समाज के बीच एक सशक्त संपर्क–सेतु का कार्य कर सके। साहित्य की दुनिया में कुछ लोग सृजन को देखकर अति-प्रशंसा के माध्यम से भ्रमित करते हैं, तो कुछ ‘और बेहतर’ की पुनरावृत्ति कर रचनाकार को हतोत्साहित करने का प्रयास करते हैं। ये दोनों ही स्थितियाँ साहित्यकार के लिए घातक सिद्ध होती हैं।
साहित्यकार सिद्धेश्वर ने यह विचार यू-ट्यूब पर सजीव प्रसारित साहित्यिक–सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘सिद्धेश्वर की डायरी’ के आरम्भ में ‘सृजन, आत्मस्वीकार और साहित्य की सच्चाई’ विषय पर विचार व्यक्त किए। इस अंक में साहित्यिक सूचनाओं के अंतर्गत डॉ. अनुज प्रभात को प्राप्त साहित्य भूषण सम्मान व सिद्धेश्वर को प्राप्त कथाबिम्ब सम्मान भी प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में भूपेंद्र कुलसी ने “हे माँ, मुझे तेरी मौजूदगी मालूम होती है” कविता का भावपूर्ण पाठ किया।
सिद्धेश्वर के संयोजन में कार्यक्रम में इस सप्ताह के अध्यक्ष आशीष आनंद आर्य व प्रभारी राज प्रिया रानी रहे।