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होली-ऐसा रंग नहीं है भाता

धर्मेंद्र शर्मा उपाध्याय
सिरमौर (हिमाचल प्रदेश)
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होली विशेष…

होली के त्यौहार में,
रंग-बिरंगे लगते वन
देख एक-दूसरे को,
फैला रहे हैं वह सुगंध।

फूल-फूल भंवरे गाते,
देते प्यार का संदेश
मगन रहते प्रेम में,
रात-दिन गुजारते।

मूर्ख मानव भूल गया,
प्रेम का त्यौहार है आया
तन को बना रहा रंगीन,
मन का मेल न धोया।

हो कोई ऐसा रंग बना जो,
मन की दूरी को दूर कराए
ऐसा रंग लगा दो मुझे जो,
बुझते घर के दीए जलाए।

हो ऐसा रंग कहीं पर,
टूटे प्रेम की डोर बंधाए
तो लगा दो ऐसा रंग जो,
टूटे हुए को साथ मिलाए।

हो ऐसा रंग कहीं पर,
जो तन के साथ मन रंगाए
ला दो ऐसा रंग कहीं से जो,
करुणा-दया भाव जगाए।

ऐसा रंग नहीं है भाता,
जो हमें ना प्रेम सिखाता।
मेल-जोल को न माने और,
गिरे हुए को नहीं उठाता॥