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४ दशक से राजभाषा हिन्दी की घोर उपेक्षा कर रही वेबसाइट

🔹राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के विरुद्ध भाषाई भेदभाव का आरोप

सेवा में,
संयुक्त सचिव (राजभाषा),
राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय,
भारत सरकार, एन.डी.सी.सी. II भवन, बी-विंग,
जय सिंह रोड, नई दिल्ली-११०००१

विषय: राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा राजभाषा अधिनियम १९६३, राजभाषा नियम १९७६ एवं सरकारी आदेशों के निरंतर, संगठित एवं जानबूझकर हो रहे उल्लंघन व उपभोक्ताओं से भाषाई भेदभाव के विरुद्ध औपचारिक आरोप-पत्र।

महोदय,
मैं अत्यंत क्षोभ के साथ आपका ध्यान राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की उस कार्यप्रणाली की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ, जो पिछले लगभग ३८ वर्षों या लगभग ४ दशकों से राजभाषा हिन्दी की घोर उपेक्षा कर रही है। आयोग ने राजभाषा अधिनियम १९६३, राजभाषा नियम १९७६ तथा भारत सरकार द्वारा समय-समय पर जारी नीतिगत आदेशों का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया है। इस वैधानिक संकट पर मैं आयोग के विरुद्ध निम्नलिखित स्पष्ट एवं विस्तृत आरोप प्रस्तुत कर रहा हूँ


◾आरोप १ : राजभाषा अधिनियम की धारा ३(३) की पूर्ण अवहेलना-
🔹अधिनियम की धारा ३(३) यह अधिदेश देती है कि संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचना, प्रशासनिक या अन्य रिपोर्ट, प्रेस विज्ञप्तियाँ, संविदाएं, निविदाएं, विज्ञापन और संसद के समक्ष रखी जाने वाली रिपोर्टें अनिवार्य रूप से हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में जारी की जानी चाहिए।
🔺तथ्य: आयोग द्वारा अब तक जारी किसी भी निर्णय, आदेश, अपील, नोटिस, परिपत्र, कार्यालय आदेश, अधिसूचना, भर्ती विज्ञापन या निविदा को हिन्दी में प्रकाशित नहीं किया गया है। यह धारा ३(३) का प्रत्यक्ष और गंभीर उल्लंघन है, क्योंकि यह धारा दोनों भाषाओं में समान रूप से प्रकाशन का स्पष्ट निर्देश देती है जिसे आयोग ने पूरी तरह ठुकरा दिया है।

◾आरोप २ : वेबसाइट का पूर्णतः एकलभाषीय और असंवैधानिक स्वरूप-
🔹भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी केंद्र सरकार के संगठनों और स्वायत्त निकायों की वेबसाइटें अनिवार्य रूप से द्विभाषी होनी चाहिए।
🔺तथ्य: आयोग की आधिकारिक वेबसाइट (http://ncdrc.nic.in) अपनी स्थापना से आज तक केवल अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध है। यह एक पूर्णतः एकलभाषीय पोर्टल है, जबकि आयोग एक लोक न्याय संस्थान है, जहाँ देश का आम नागरिक न्याय की गुहार लगाता है। हिन्दी संस्करण तैयार करने हेतु आयोग ने कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया और न ही इसके लिए किसी भी अधिकारी या विभाग को उत्तरदायी ठहराया गया है।

◾आरोप ३ : हिन्दी में दायर आवेदनों को स्वीकार न करना एवं भाषाई भेदभाव-
🔹राजभाषा नीति का मूल आधार यह है, कि जनता को अपनी भाषा में सरकारी निकायों से संवाद करने का अधिकार है।
🔺तथ्य: उपभोक्ताओं द्वारा हिन्दी में प्रस्तुत की गई अपीलें और अर्जियाँ आयोग में स्वीकार ही नहीं की जातीं। यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि राजभाषा और भारतीय जनता के प्रति खुला भेदभाव है। आज़ाद भारत में एक अर्ध-न्यायिक संस्था द्वारा राष्ट्र की राजभाषा के प्रयोग को ही प्रतिबंधित कर देना राष्ट्रीय शर्म का विषय है और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। आयोग ३८ वर्षों से भाषाई आधार पर भेदभाव कर रहा है और निंदनीय यह है कि कोई भी इस भेदभाव को रोकने की कार्यवाही नहीं कर रहा है।

◾आरोप ४ : कार्यालयीन कार्यप्रणाली में हिन्दी का पूर्ण और संगठित बहिष्कार-
🔹राजभाषा नियम, १९७६ के नियम ५ के अनुसार हिन्दी में प्राप्त पत्र का उत्तर अनिवार्य रूप से हिन्दी में ही दिया जाना चाहिए।
🔺तथ्य: आयोग में न तो पत्र शीर्ष, न रबर मुहर, न लिफ़ाफ़े और न ही कार्यालय आदेशों में हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। यहाँ तक, कि हिन्दी में प्राप्त शिकायतों का उत्तर भी हिन्दी में नहीं दिया जाता। स्थिति इतनी दयनीय है, कि आयोग की कार्यवाहियों के दौरान अधिवक्ताओं तक को हिन्दी में तर्क रखने से अनुचित रूप से रोका जाता है, जो राजभाषा नियमों का घोर उल्लंघन है। आयोग के अधिकारियों का तो यह भी कहना है कि हमारे पास धन की कमी है इसलिए हम हिन्दी में काम नहीं कर सकते हैं और इसीलिए हम अंग्रेजी थोपते रहेंगे, क्योंकि हम लोग राजा हैं और राजा कभी भी जनता की भाषा में काम नहीं करता है। जनता की भाषा में काम करने से राजा और जनता का भेदभाव मिट जाएगा। आयोग अंग्रेजी थोपकर बार-२ भारत के संविधान को ठेंगा दिखा रहा है, कि हम लोकतंत्र को नहीं मानते हैं इसलिए अंग्रेजों की भाषा भारत की जनता पर थोपते रहेंगे।

◾आरोप ५ : मिथ्या आश्वासन एवं शासन व जनता के साथ छल-
🔹राजभाषा विभाग के प्रति जवाबदेही और अनुपालन सुनिश्चित करने के बजाय आयोग ने गुमराह करने की रणनीति अपनाई है।
🔺तथ्य: वर्ष २०१४ में आयोग ने केवल एक बार यह औपचारिक घोषणा की थी, कि “हिन्दी वेबसाइट शीघ्र प्रारम्भ की जाएगी”। किंतु इस वादे के ११ वर्ष बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। यह जान-बूझकर किया गया छल एवं जनता व शासन को भ्रमित करने का एक अत्यंत गंभीर उदाहरण है। इन सभी वर्षों में राजभाषा विभाग द्वारा प्रेषित चेतावनियों और पत्रों की भी आयोग ने निरंतर अवहेलना की है, जिससे यह प्रतीत होता है कि आयोग स्वयं को राजभाषा विभाग के नियमों से ऊपर मानता है।

अतः आपसे सादर निवेदन है, कि: इस विषय की गंभीरता और आयोग के दशकों पुराने अड़ियल रवैये को देखते हुए आयोग के विरुद्ध एक विस्तृत जाँच प्रतिवेदन तैयार किया जाए।

इस प्रकरण को संसदीय राजभाषा समिति के समक्ष तत्काल प्रभाव से प्रस्तुत किया जाए।
राजभाषा अधिनियम के उल्लंघन के उत्तरदायी अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी प्रशासनिक एवं अनुशासनात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य संस्थान द्वारा राजभाषा का ऐसा अपमान न हो सके।

शीघ्र एवं न्यायोचित कार्यवाही की प्रतीक्षा में।

भवदीय,
बृजेश कुमार तिवारी
ग्मऊगंज (मध्य प्रदेश) पिनकोड – ४८६३४१

प्रतिलिपि सूचनार्थ प्रेषित:
माननीय गृह मंत्री, भारत सरकार।
सचिव, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार।
सचिव, संसदीय राजभाषा समिति, नई दिल्ली।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुम्बई)