कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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वक़्त कैसा आ गया अब धरा पर,
हवा भी डरने लगी अपनी ज़िंदगी से
धरती भी अब निराशा रहने लगी है,
गगन में तारे भी आँसू बहाने लगे हैं।
जो ना कर सके हमारी रक्षा,
पर्यावरण की तो कहाँ कहीं
धरती पर चिड़ियों की चहचहाहट रहेंगी,
किसी दिन सब खत्म हो जाएगी।
हवा भी सिसकियाँ अब लेने लगी है,
तन-बदन अब हवाओं का झुलसने लगा है
वक्त का कैसा खेल आया है धरा से गगन तक,
गोले-बम हवाओं में भी जहर भरने लगे हैं।
नदियाँ भी अब बेरुखी से सिमटने लगी हैं,
पानी का कतरा-कतरा रो-रो के दर्द कह रहा है
रेत दिखती है पानी के चारों दिशाओं में फैली,
कश्ती को अब किनारा कहाँ मिलेगा ?
मेहरबानी कर दो तुम मुझ पर,
पर्यावरण हो या वायुमंडल सब कह रहे हैं
मनुष्य से कर रहे हैं विनती अब बिलख कर,
तुम जीते, मैं हारा अब बख्श दो हे मानव मुझको।
कुदरत की करो सब मिलकर कदर,
वक्त जो गया फिर कहाँ मिलेगा
ना रहा हरा-भरा जग तो फिर,
चिड़ियों की चहचहाहट कहाँ रहेगी।
हमसे ही जग है हम पर ही प्रहार,
मैं माँ हूँ तेरी, कभी तो समझो।
हाँ मैं हूँ प्रकृति तुम्हारी,
कदर हमारी कभी तो कर लो॥