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अनिश्चित विश्व का विलाप

डॉ. शैलेश शुक्ला
बेल्लारी (कर्नाटक)
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अंधियारे में डूबा दिख रहा है सम्पूर्ण संसार,
भविष्य में दिख रहा हर ओर बस अंधकार
कहीं है महामारी तो कहीं है युद्ध की आग,
सुख-शांति की चाह में, हर ओर दौड़-भाग।

जलवायु बदल रही, धरती है देखो रोती,
नदी-तालाब सूख रहे, धरा हरियाली खोती
तकनीक बढ़ रही लेकिन प्रकृति पीछे छूट रही,
लोभ की दौड़ में प्रकृति की साँसें टूट रहीं।

विश्वास घट रहा इक-दूजे में, बढ़ रहा भय,
ऐसे में भला कैसे होगी मानवता की जय
सच की हर आवाज पर हर ओर प्रहार है,
निश्चित दिख रही जन-मानस की हार है।

लोभ की आँधी चल रही है हर ओर,
स्वार्थ का अंधकार छाया है घनघोर
धर्म और जाति के झगड़े हर ओर बढ़ रहे,
नफरत फैलाने वाले नए फ़साद गढ़ रहे।

शक्ति-सत्ता के शोर में दबी हर पुकार है,
न्याय की उम्मीद रखना भी बेकार है
काम सभी हो रहे हैं बस लाठी के बल पर,
कमजोर को कहीं भी चैन नहीं पल भर।

हर ओर गोली, बम, बारूद, मिसाईल और तोप,
तमाशा चुप हो देख रहे, पंडित, मौलवी और पोप
ताकत जिसके पास, वो सबको है धमका रहा,
भय दिखा शक्ति का, स्वयं को चमका रहा।

समुद्र उफन रहे और हिमखंड देखो पिघल रहे,
धरती के आँसू, पर्यावरण प्रेमियों को खल रहे
प्रकृति है पुकार रही, पर लोग बने हैं बहरे,
लाभ-लोभ के दलदल में सब गड़े हैं गहरे।

फिर भी उम्मीद की किरण है कहीं-न-कहीं,
मानव यदि जागे तो राह अवश्य मिलेगी यहीं
परस्पर सहयोग, करुणा और प्रेम का संग,
बदल सकता है यह अनिश्चितता का रंग।

अब भी कुछ आशावादी, आशा की किरण जगाए,
मानवता के कल्याण हेतु, खड़े हैं प्रेम-दीप जलाए।
अशांत दिख रहे इस विश्व में शांति के आसार होंगे,
किसी न किसी दिन इनके सपने जरूर साकार होंगे॥