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कौन देखता आइना यहाँ पर ?

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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जनभाषा में न्याय…

हर कोई दोस्ती करना चाहता है,
हर कोई दिवानगी में आगे आना चाहता है।

फोन में तरह तरह के एप हैं, खिल जाते हैं मन यहाँ,
फोन फ्रेंड बनते हैं, फिर फोन से खत्म भी हो जाते हैं।

कौन देखता आइना यहाँ पर,
अब तो खूबबसूरत-सी परी देखते हैं यहाँ।

टूट कर बिखर जाते हैं सभी यहाँ,
अब हर रिश्ता चैट पर टिका है।

कौन किसका है अपना भला!
अब तो सभी ऑनलाइन पर नजर रखते हैं।

लिपिस्टिक मिटाने को बस लब को चूमते हैं सभी,
हर कोई एक-दूसरे में कमी देखने में लगा है।

फूलों में भी खुशबू नहीं रही अब,
जमाने में तो बस डुप्लीकेट का चलन है।

जिधर देखो मुहब्बत में टूटे बिखरे हैं सभी,
झूठे आदमी ही बस नजर आते हैं यहाँ।

सामने आते ही प्यार जता देते हैं मिलने बाले,
हमसे तो सभी की नाराजगी का दौर चला है।

खुश रहना आसान नहीं है यहाँ ‘ऋतु’,
मंजिल जो चुनी है तूने आसमां छूने की अभी॥