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‘तरूणाई पर डगमग मन…’ से याद किया कालजयी रचनाकार पं. त्रिपाठी को

जौनपुर (उप्र)।

कालजयी रचनाकार पं. रूपनारायण त्रिपाठी की पुण्य स्मृति को समर्पित ‘गीत रूप नमन समारोह २०२६’ के अंतर्गत अखिल भारतीय कवि सम्मेलन हुआ। शुरूआत मानस कुम्भ से हुई, जिसमें मानस मर्मज्ञ डॉ. आर.पी. ओझा ने श्रीरामचरितमानस और त्रिपाठी जी के काव्य का तुलनात्मक स्वरूप प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने कहा कि स्व. त्रिपाठी ने अपने साहित्यिक योगदान से पूरे हिन्दी जगत को गौरवान्वित किया है।
सम्मेलन का श्रीगणेश युवा गीतकार डॉ. विनम्र सेन सिंह ने ‘तरूणाई पर डगमग मन चंचल मधु छाया है। गीतों का ये मौसम है अब बसन्त आया है’ गाकर किया। कवि अतुल वाजपेई ने ‘बल-बुद्धि पराक्रम के सागर, जिनके आयुष धनु सायक है।’ जैसी पंक्तियों से राष्ट्रीय ऊर्जा का संचार किया। प्रियांशु गजेन्द्र, डॉ. सुशील साहिल, व्यंगकार सभाजीत द्विवेदी प्रखर की कविताएं अलग रंग की रहीं, जबकि शीर्षस्थ गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने ‘साँसों के गजरे कुम्हलाये, आप न आये। यह अमराई कौन अगोरे, अब तो हुए हैं भार टिकोरे, अंग-अंग महुआ गदराए, आप न आये’ जैसे अनेक गीतों से कवि सम्मेलन को नयी ऊंचाई दी।

अध्यक्षता प्रो. राममोहन पाठक ने की। आमंत्रित कवियों को उ.प्र. भाषा संस्थान लखनऊ एवं रूप सेवा संस्थान की ओर से संरक्षक राम कृष्ण त्रिपाठी, प्रो. मनोज मिश्र, एवं सचिव लोकेश त्रिपाठी ने सम्मानित किया।