कुल पृष्ठ दर्शन : 2

द्रुपदसुता स्वयंवर

राधा गोयल
नई दिल्ली
******************************************

द्रुपदसुता के स्वयंवर के लिए शर्त रखी थी एक,
जल में बिम्ब देख शर से मछली की आँख दे भेद
उसी वीर से मैं अपनी पुत्री का विवाह करूँगा,
और द्रोण से फिर अपने अपमान का बदला लूँगा।

मछली की परछाईं देख कर, किया आँख का भेदन,
ब्राह्मण वेश में आया था वो, नाम था उसका अर्जुन
द्रोपदी ने तब खुशी-खुशी वरमाल गले में डाली,
द्रुपदराज ने मन में कितनी ही इच्छाएँ पालीं।

किन्तु हाय! द्रोपदी सिर्फ अर्जुन की प्रिया नहीं थी,
पाँच पति की पत्नी बनने की क्यों सजा मिली थी ?
जीता था अर्जुन ने, लेकिन मिला न उसका साथ,
माँ ने कहा बाँट लो सब, और मौन रह गये पार्थ।

मुख से चाहे कुछ न कहा, पर मन में रही ये फाँस,
माँ कुन्ती और धर्मराज से रही न कोई आस
अर्जुन और द्रोपदी की, पीड़ा का ओर न छोर,
पाँच पति की पत्नी का, अपमान हुआ था घोर।

पाण्डव और कुरुपुत्रों में बचपन से ही दुश्मनी थी,
इन्द्रप्रस्थ की चमक-दमक को देख के अधिक बढ़ी थी
द्यूत खेलने का आमंत्रण, भेजा इन्द्रप्रस्थ को,
कर स्वीकार युधिष्ठिर फौरत, चले हस्तिनापुर को।

दुर्योधन की ओर से पासे, शकुनी ने फेंके थे,
उसकी चाल से युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ को हार गए थे
एक-एक कर चारों भाइयों को दाँव लगाया,
हार गए तो जुआरी ने, पत्नी को दाँव लगाया।

अब तो सब कुछ हार चुके थे, कुछ भी बचा न शेष,
भाइयों सहित गुलाम बन गया, जो था कभी नरेश
दुर्योधन ने दुःशासन को दिया एक आदेश,
पाँच पति की पत्नी को ले आओ पकड़कर केश।

शकुनी की कपटी चालों से खुद को भी जब हारा,
इन्द्रप्रस्थ का सारा राज्य भी जुएं में हारा
तब भी समझ न आई, पुनः जीतने की चाहत में,
द्रोपदी को भी दाँव पे उसने लगा दिया और हारा।

लोग कहें वो ‘धर्मराज’ थे, पर मैं कैसे मानूँ ?
अपनों पर जो दाँव लगाए, धर्मराज क्यों मानूँ ?
साधारण मानव भी ऐसा कृत्य यदि करता तो,
उसे अधम पापी की श्रेणी में ही रखना जानूँ।