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शिव चंदन का वृक्ष

प्रीति तिवारी कश्मीरा ‘वंदना शिवदासी’
सहारनपुर (उप्र)
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शिव चंदन का वृक्ष है जग में, मैं हूँ विष की बेली।
बन भुजंग लिपटत हूँ उनसे तड़पत फिरूं अकेली॥

शिव अति शीतल मन माया अगन भरी,
विषय-भोग अटखेली नित-नित विषय-भोग अटखेली॥

भजन को रस जागा भगति में मन लागा,
शरणागत‌ मैं चेली गुरु शिव ‌ शरणागत मैं चेली॥

नाम स्वाद चख री रसना जतन कर,
शिव ही गुड़ की भेली, रसना शिव ही गुड़ की भेली॥

सुख में भी रट शिव, दु:ख में भी रट शिव,
सुलझे न जगत पहेली, रसना सुलझे न जगत पहेली॥

तत्पर रह अब बाट‌ जोहूं प्रभु,
बन के नार नवेली, मनवा बन‌ के नार नवेली॥

भक्ति से दूर करें, उन से मैं दूर होऊं,
झटपट विलग हूँ गेली री, मैं झटपट विलग हूँ गेली॥

छोड़ अभिमान सारे शिव नाम के सहारे,
तन मेरा माटी की ढेली, सच में तन मेरा माटी की ढेली॥

शिव चंदन का वृक्ष है जग में, मैं हूँ विष की बेली।
बन भुजंग लिपटत हूँ उनसे, तड़पत फिरूं अकेली॥