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समय इसे भर पाएगा…?

डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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होली विशेष…

आज गुलाल में वो लाली नहीं,
अबीर में वो खुशबू कहाँ ?
हरियाली दूर छूट गई,
पीली सरसों टूट गई।

पलाश में वो रंग कहाँ ?
फाग के गीत मधुर नहीं
गुजियों की मिठास फीकी लगी,
ढोल की थाप धीमी लगे।

सजन तुम बिन सब सूना है,
प्यार की धुन बुझ-सी गई
इस रंग-बिरंगी होली में,
मेरा मन उदास और खाली है।

क्या समय इसे भर पाएगा?
मेरे आँसू रोक पाएगा!
सारे रंग फीके पड़ गए,
तुमने जो प्रीत से संजोए थे॥