गोष्ठी-विमर्श…
दिल्ली।
लेखक श्रीधर पराड़कर ने प्रत्येक अध्याय शोध कर लिखा है। यह पुस्तक भारत के साहित्य जगत के वातावरण को बदलने के लिए प्रेरित करती है, साथ ही इसे भारतीयता से ओत-प्रोत करने की बात कहती है।
यह बात अ.भा. साहित्य परिषद् द्वारा रविवार को नई दिल्ली के प्रवासी भवन में श्रीधर पराड़कर कृत ‘साहित्य का धर्म’ पुस्तक पर आयोजित गोष्ठी में परिषद् के अ.भा. महामंत्री पवनपुत्र बादल ने कही। गोष्ठी में ‘साहित्य परिक्रमा’ के संपादक इन्दुशेखर तत्पुरुष ने कहा कि यह पुस्तक शास्त्रीय विवचन नहीं, अपितु साहित्य का लोकपक्ष और समसामयिक चित्रण प्रस्तुत करती है। लेखक ने लेखकीय उत्तरदायित्व पर गंभीरता से विचार किया है। सुधित मिश्रा, सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा, अजीत कुमार एवं अंकित कुमार दुबे ने भी कहा कि यह पुस्तक भारतीय जीवन दृष्टि का गहराई से अध्ययन प्रस्तुत करती है। भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठित करने की बात कहती है।
इस अवसर पर परिषद् के अभा. सह कोषाध्यक्ष कमलाकान्त गर्ग, कार्यालय सचिव संजीव सिन्हा, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के संयुक्त महामंत्री बृजेश कुमार गर्ग सहित कई साहित्यकार एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।
शोधार्थी वरुण कुमार ने इसका संचालन किया।