डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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नई-नई तहसील बनी थी, इसलिए कुछ स्थाई स्टॉफ आ गया था तथा शेष स्टॉफ की अस्थाई नियुक्ति होनी थी। उक्त पदों पर तहसील के एक प्रभावशाली नेता अपने परिचितों की नियुक्ति करना चाहते थे, पर कपूर साहब इसके लिए तैयार नहीं थे। कपूर साहब विज्ञापन देखकर बाकायदा इन पदों को भरना चाहते थे। इस हेतु वह अपने अधिकारी से अनुमति चाहते थे, पर उन्हें अनुमति नहीं मिल पा रही थी। आज उन्हें अधिकारी ने मुख्यालय पर बुलाया था।
वहाँ पहुँचकर कपूर साहब हतप्रभ रह गए, क्योंकि बड़े साहब ने नेताजी के लोगों के आदेश मुख्यालय से ही निकाल दिए थे। यह सूचना देने के लिए ही उन्होंने कपूर साहब को बुलाया था। कपूर साहब का मन यह सुनकर खिन्न हो गया। वह अपने सहायक के साथ बाहर आए, जीप में बैठने वाले थे कि तभी उन्हें बहुत जोर से ठहाके की आवाज सुनाई पड़ी। उन्होंने देखा, कि नेताजी अपने साथियों के साथ मारुति से टिके खड़े थे और उनकी और इशारा कर हँस रहे थे। कपूर साहब का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा। उनके सहायक ने जब उनके चेहरे के बदलते हुए रंग को देखा तो वह बोला- “सर ! छोड़िए उसे… हल्का आदमी है, आपकी तरह मुझे भी उस पर बहुत क्रोध आ रहा है पर…!”
अपने सहायक की बात सुनकर कपूर साहब गाड़ी में बैठते-बैठते बोले- “तुम गलत सोच रहे हो… मुझे क्रोध उस पर नहीं, बल्कि अपनी असहायता पर आ रहा है।”
नेताजी की गाड़ी काला धुआँ छोड़ती हुई उनके करीब से निकल गई।