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अहंकार से मुक्ति और जिम्मेदारी का बोध कराती है माँ नर्मदा

‘नर्मदा साहित्य मंथन’…

इंदौर (मप्र)।

माँ नर्मदा नदी मनुष्य को अहंकार से मुक्ति दिलाने के साथ ही जिम्मेदारी का बोध भी कराती है। नर्मदा केवल एक शब्द नहीं है। जो नदी नर का मद यानी अहंकार हर ले, वही नर्मदा नदी है। यदि मनुष्य हो अपने अहंकार से मुक्ति चाहिए तो उसे नर्मदा नदी की शरण में जाना ही होगा।
‘नर्मदा साहित्य मंथन’ के प्रथम सत्र में ‘नर्मदा, तुम बहती रहो’ विषय पर देवी अहिल्या विवि के सभागार में शनिवार को मध्यप्रदेश के कैबिनेट मंत्री व नर्मदा परिक्रमावासी पहलाद पटेल ने यह बात कही। मंथन ‘भारत उदय’ के इस प्रथम सत्र में ३ परिक्रमावासियों ने अपनी बात रखी। विश्व संवाद केंद्र (मालवा प्रान्त) और विवि की पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला के तत्वावधान में इस मंथन में नर्मदा नदी, सिनेमा और भारत, भारत की चुनौतियाँ, भारतीय साहित्य और परिवार जैसे विषयों पर गहन चिंतन हुआ। इस मौके पर अध्ययनशाला के पत्र ‘प्रयोग’ का विमोचन विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली नरगुंदे ने अतिथि श्री पटेल से कराया।
विवि के कुलगुरू एंव नर्मदा परिक्रमावासी डॉ. राकेश सिंघई ने कहा कि नर्मदा नदी की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है। नर्मदा सहित सभी नदियों के लिए आज का समय हमारे लिए आत्ममंथन का ही है।
नर्मदा परिक्रमावासी और पत्रकार ओम द्विवेदी ने कहा कि नर्मदा माई विज्ञान का नहीं, बल्कि आस्था का विषय है। नर्मदा माई को तर्कों से नहीं समझा जा सकता है। वह तो मन और विश्वास से जुड़ी हुई है। माई तो तथास्तु कहना यानी देना ही देना जानती है, लेकिन हमारे पास वह आस्था और दृष्टि होना चाहिए। नर्मदा माई का बहना और बहाव के नाद का एक दर्शन है, जिसे समझने के लिए दृष्टि चाहिए।
◾भारतीयों को वैचारिक बंटवारे को समझना होगा
द्वितीय सत्र में ‘दृष्टि ही दृष्टांतःगाजा से कश्मीर’ विषय पर स्तंभकार, वकील और लेखक अनुपम मिश्र ने संवाद किया। श्री मिश्र ने कहा कि आज के दौर में नैरेटिव से ही धारणा बनती है और धारणा अत्यंत शक्तिशाली होती है। जो बात बार-बार दिखाई और सुनाई जाती है, वही धीरे-धीरे समाज की दृष्टि और आदत बन जाती है। समस्या यह है कि ऐसा दृष्टांत रचा जाता है कि आम व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि वास्तव में हो क्या रहा है। हमारे देश में नैरेटिव की कमजोरी एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। आज आवश्यकता इस बात कि है कि भारतीय वैचारिक आधार पर किये जा रहे बंटवारे को समझे। लोग सतर्क रहें, पढ़ें स्वयं, तथ्यों को समझें और यह पहचानें कि आज की आभासी दुनिया में दृष्टि और दृष्टांत के बीच अंतर क्या है।
◾बॉलीवुड ने भारत की छवि को विकृत पेश किया
मंथन के तृतीय सत्र में ‘भारत का सिनेमाःसिनेमा में भारत’ विषय पर जेम्स ऑफ बॉलीवुड प्लेटफॉर्म की प्रमुख श्रीमती स्वाति गोयल शर्मा ने कहा, कि पाकिस्तान की फिल्मों में भारत की छवि को वर्ग आधारित नैरेटिव के साथ प्रस्तुत किया जाता है, जो गलत है। विभाजन के बाद भी पाकिस्तान के नैरेटिव को भारत में चलाने का श्रेय भी बॉलीवुड को ही जाता है। भारत के कुछ निदेशकों ने पाकिस्तान के गलत नैरेटिव को भारत में सही बताने का काम किया। सत्तर के दशक में फिल्मों और शायरियों में उर्दू शब्दों का प्रयोग हिन्दू विरोधी नैरेटिव को बढ़ाने में किया गया। फिल्मों ने ही भारत में लव जिहाद को भी बढ़ावा दिया। भारत माता के स्वरूप को विकृत करने का का भी भारत में फिल्मों के माध्यम से किया गया।
◾आत्मनिर्भर विकास मॉडल ही भारत की ताकत
चतुर्थ सत्र में जियो पोलिटिकल एनालिस्ट आदि अंचित ने ‘विश्व पटल पर भारतःचुनौती और तैयारी’ विषय पर कहा कि वैश्विक पटल पर भारत के समक्ष उपस्थित चुनौतियाँ केवल राजनीतिक या आर्थिक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सांस्कृतिक और वैचारिक स्तर पर भी गहरी होती जा रही हैं। यदि कोई देश भारत के विरुद्ध गलत आचरण करता है, तो उसे रोकना और दोषियों को दंडित करना राष्ट्रहित की स्वाभाविक प्रक्रिया है। भारत की आर्थिक नीति किसी डॉलर विरोधी नहीं, बल्कि रूपए को मजबूत करने और आत्मनिर्भर विकास मॉडल पर आधारित है। यह दृष्टिकोण भारत को संतुलित और स्वतंत्र वैश्विक भूमिका प्रदान करता है।
◾लोकगीत भारतीय संस्कृति की आत्मा
पंचम सत्र में ‘संस्कृति के संवाहकःलोकगीत’ विषय पर साहित्यकार श्रीमती सुमन चौरे ने कहा, कि भारतीय गीतों की अपनी महान परंपरा रही है। लोकगीत भारत की पहचान भी रहे हैं। लोकगीत भारतीय संस्कृति की आत्मा है। गांव की सदियों पुरानी परंपराओं, घर की मिट्टी, संस्कृति, परंपराओं की महक लोकगीतों में महसूस की जा सकती है। वास्तव में देखा जाए तो भारतीय दर्शन ही लोकगीतों के बिना अधूरा है।
◾संयुक्त परिवार बनाने के लिए बच्चों को तैयार करें
अंतिम सत्र में ‘भारतीय साहित्य और संस्कृति में परिवार’ विषय पर लोक गायिका पद्मश्री श्रीमती मालिनी अवस्थी ने कहा कि जीवन-मूल्य परिवार की आधारशिला पर ही निर्मित होते हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य का बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज संयुक्त परिवार व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिसका सीधा असर बच्चों की परवरिश पर दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि पहले समाज में सामूहिकता का भाव था, जो अब धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा है।हमें आज बच्चों को रामायण पढ़ाने की जरूरत है।