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आग का दरिया:क्या होगा भविष्य

डॉ. शैलेश शुक्ला
बेल्लारी (कर्नाटक)
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२८ फरवरी २०२६ की वह रात मध्य-पूर्व के इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज होगी, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही भुला सकें। ठीक रात २ बजकर ३० मिनट पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक ८ मिनट का वीडियो बयान जारी करते हुए ऐलान किया कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य अभियान शुरू कर दिया है। इसका नाम रखा गया ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’। ट्रम्प ने कहा कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं, हमास और हिजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी समूहों को दिया जाने वाला समर्थन और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने की उसकी नीति अब बर्दाश्त के काबिल नहीं रही। उन्होंने यह भी कह दिया, कि इस अभियान में अमेरिकी सैनिकों की जानें जा सकती हैं, लेकिन यह जोखिम उठाना जरूरी है। इस एक बयान के साथ दुनिया का सबसे अशांत क्षेत्र एक नई, और कहीं अधिक खतरनाक जंग की आग में झोंक दिया गया।

इजराइल और अमेरिका के संयुक्त हमलों ने ईरान के तेहरान, कोम, इस्फहान, करज और कर्मानशाह जैसे प्रमुख शहरों को निशाना बनाया। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनई की हत्या हो गई और उनके परिसर को नष्ट कर दिया गया। केवल पहले ७ दिन में २५०० से अधिक हवाई हमले किए गए और ६००० से ज्यादा हथियार दागे गए।
ईरान ने हमलों का जवाब देने में देर नहीं लगाई और इजराइल और खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलों और ड्रोन की बरसात शुरू कर दी।
इससे खाड़ी देशों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक और जटिल बनकर उभरी है। बहरीन में ईरानी ड्रोन ने १ तेल शोधन संयंत्र को नुकसान पहुंचाया। इस युद्ध का सबसे गंभीर आर्थिक परिणाम है होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद हो जाना। ईरान ने इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है और धमकी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले किसी भी जहाज को आग का सामना करना पड़ेगा। यह वही जलमार्ग है जिससे दुनिया की लगभग २० प्रतिशत तेल आपूर्ति और वैश्विक एलएनजी व्यापार का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऊर्जा नीति विशेषज्ञों के अनुसार इस बंदी के कारण वैश्विक गैस बाजार में करीब १३० अरब घन मीटर वार्षिक आपूर्ति बाधित हो गई है, जो अभूतपूर्व है। ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत ९० डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई, जो अप्रैल २०२४ के बाद सबसे ऊँचा स्तर है। मध्य-पूर्व से चीन तक कच्चा तेल ढोने वाले विशाल टैंकरों की दरें ९४ प्रतिशत से अधिक बढ़कर एक दिन में ४,२३,७३६ डॉलर हो गईं। वैश्विक शेयर बाजारों पर भी इसका भारी असर पड़ा:डाओ जोन्स सूचकांक एक दिन में १ हजार से अधिक अंक गिरा और यूरोपीय स्टॉक्स ६०० सूचकांक २.७ प्रतिशत तक लुढ़का।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने चिंता व्यक्त की कि लेबनान मध्य-पूर्व संघर्ष का अगला प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है और उन्होंने तत्काल युद्धविराम की अपील की। संयुक्त राष्ट्र ने अनुमान लगाया है कि पूरे क्षेत्र में ३ लाख ३० हजार से अधिक लोग जबरन विस्थापित हो चुके हैं।
इस युद्ध में रूस की भूमिका भी सामने आई है, जबकि युद्ध के कारण रूसी ऊर्जा उत्पादों की मांग में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने भारत को ३० दिनों की एक विशेष छूट दी, जिसके तहत भारतीय रिफाइनरियाँ रूसी तेल खरीद सकती हैं, जो पहले अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में था। यह कदम इसलिए उठाना पड़ा, क्योंकि भारत अपने कुल कच्चे तेल आयात का लगभग ४० प्रतिशत होर्मुज जलडमरूमध्य से प्राप्त करता है और फिलहाल वह बंद है। यह कूटनीतिक विरोधाभास उस दबाव की झलक है, जो ट्रम्प प्रशासन के भीतर ऊर्जा कीमतों को लेकर बना हुआ है।
इस युद्ध की पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है। २०२६ की शुरुआत में ईरान के भीतर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जो कमजोर अर्थव्यवस्था और जर्जर बुनियादी ढांचे से उपजी जनता की निराशा को दर्शाते थे। इन्हें बलपूर्वक दबाया गया। सीरिया में ईरान के चिरपरिचित सहयोगी राष्ट्रपति असद का तख्ता पलट हो चुका था और हमास तथा हिजबुल्लाह को इजराइल ने २०२४ और २५ में किए गए ऑपरेशनों में काफी कमजोर कर दिया था। सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के अनुमान के अनुसार इस ऑपरेशन के पहले १०० घंटों में ३.७ अरब डॉलर का खर्च हो चुका था, यानी प्रतिदिन लगभग ८९ करोड़ डॉलर। इसमें से ३.५ अरब डॉलर बजट से बाहर था।
ट्रम्प प्रशासन ईरान से ‘बिना किसी शर्त के आत्मसमर्पण’ की मांग कर रहा है। ट्रम्प ने १ मार्च को एक क्षणिक बातचीत के संकेत भी दिए, लेकिन ईरान के अली लारीजानी ने किसी भी वार्ता को खारिज कर दिया। यह असमंजस दिखाता है, कि इस युद्ध का कोई स्पष्ट कूटनीतिक रास्ता फिलहाल नजर नहीं आता।
भारत की दृष्टि से यह संघर्ष कई कारणों से बेहद चिंताजनक है। भारत खाड़ी देशों में रहने वाले ९० लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा के बारे में चिंतित है। ईरान के साथ भारत के ऊर्जा और आर्थिक सम्बंध लंबे समय से चले आ रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत के ऊर्जा आयात पर सीधा असर पड़ रहा है, क्योंकि हमारे कुल तेल आयात का लगभग ४० प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आता है। भारत ने ३० दिनों की अमेरिकी छूट का उपयोग करके रूसी तेल खरीदने का रास्ता अपनाया है, जो एक व्यावहारिक लेकिन अस्थायी समाधान है। इस क्षेत्र में फंसे भारतीय नागरिकों की निकासी के लिए भी भारत सरकार को युद्धस्तर पर काम करना होगा। यह परिस्थिति एक बार फिर सिद्ध करती है, कि मध्य-पूर्व की अस्थिरता भारत के लिए केवल एक विदेश नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि एक सीधी आर्थिक और मानवीय चुनौती भी है।
यह युद्ध दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर गया है, जहां से पीछे लौटना बेहद कठिन दिखता है। एक तरफ एक परमाणु हथियार सम्पन्न शक्ति इजराइल, तो दूसरी तरफ अमेरिका जैसी महाशक्ति और उनके निशाने पर एक देश जो अपनी धरती पर लड़ रहा है, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। खाड़ी के अरब देश, जो चाहते थे कि ईरान कमजोर हो, आज उसी ईरान की मिसाइलें झेल रहे हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार की आपूर्ति श्रृंखला एक ऐसी जगह टूट गई है, जिसे जल्द जोड़ना असंभव लग रहा है। रूस जैसे देश इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी ऊर्जा बिक्री और रणनीतिक पकड़ मजबूत कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि मध्य-पूर्व की जंगें लम्बी चलती हैं और उनके घाव दशकों तक नहीं भरते। आज जरूरत है, कि दुनिया के जिम्मेदार राष्ट्र एक होकर युद्धविराम की पहल करें, नागरिकों की जान बचाएं और एक ऐसी कूटनीतिक प्रक्रिया शुरू करें जो ईरान के परमाणु सवाल का समाधान बातचीत से निकाल सके। यह जंग किसी की जीत से नहीं, बल्कि सबकी हार से खत्म होगी, जब तक कि कोई साहसी कदम नहीं उठाया गया।