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आराधन गिरधर का

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष…

हे अर्जुन के सारथी, हे गिरिधर गोपाल।
नंदलाल यशुमति लला,राधा प्रीत निहाल॥

कृष्ण लाल प्रिय राधिका, प्रथम प्रीत मनमीत।
युवा वयसि सखि रुक्मिणी, कहाँ मुरलिया गीत॥

तुम से तुम का मधु सफ़र, राधा मोहन प्रीत।
तरसी मुरली श्रवण को, मुरलीधर संगीत॥

नवयौवन केशव वयस, शौर्य नीति रत योग।
धर्म न्याय परमार्थ पथ, कहाँ प्रीत संयोग॥

खल कामी दानव अनघ, मारा मातुल कंस।
मूढ़ खली शिशुपाल को, किया पूतना ध्वंस॥

तज वृन्दावन बालपन, लीलाधर तज मोह।
कृष्ण चले पुरुषार्थ पथ, धर्मयुद्ध आरोह॥

लोक स्वस्ति रक्षण जगत, सत्य न्याय बन सार्थ।
नारी रक्षण पथ सतत, मीत बना रथ पार्थ॥

धर्मयुद्ध कुरुक्षेत्र में, चतुर्योग उपदेश।
कर्मयोग जीवन सफल, दिया ज्ञान ऋषिकेश॥

नश्वर तन-धन लोक में, क्यों करते हो शोक।
लाया क्या जो खो गया, कर्म अमर आलोक॥

राजनीति बस ध्येय जग, परमारथ धर्मार्थ।
मानवता नैतिक रथी, समझ यही पुरुषार्थ॥

मन नटखट द्रुतगति चपल, निग्रह नित अभ्यास।
तज भौतिक सुख मोह से, आत्मबोध आभास॥

सर्व पाप अधिराज मन,प्रोत्साहक नित चाह।
छल प्रपंच हिंसा कपट,रोग द्वेष गुमराह॥

वशीभूत कर मन मनुज, भक्ति प्रीति हो ज्ञान।
राजयोग निष्काम मन, मिले कीर्ति सम्मान॥

मधुसूदन उपदेश से, तजे मोह मन पार्थ।
जागा फिर पुरुषार्थ मन, चलो मीत रथ सार्थ॥

मन मुकुन्द नायक जगत, दामोदर जगदीश।
गोवर्धनधारी किसन, शान्तिदूत अवनीश॥

सर्जक पालक कृष्ण जग, खलहन्ता विघ्नेश।
अवतारी द्वापर हरि, कृष्ण देव मथुरेश॥

अमन शान्ति मन भावना, बने कृष्ण रणछोड़।
जरासंघ खल दनुज से, नहीं किया गठजोड़॥

पांचजन्य अनुनाद रण, चक्रपाणि विख्यात।
मोर मुकुट घनश्याम प्रभु, हरे त्रिविध आघात॥

यादवेन्द्र निर्मेष हरि, जगन्नाथ अभिराम।
भक्ति प्रीति राधा रमण, वासुदेव सुखधाम॥

बसे द्वारिकाधीश मन, रंगनाथ अविराम।
बालाजी मधुवन मुदित, बद्रीनाथ सुनाम॥

दिवस जन्म श्रीकृष्ण की, चलें मनाऍं आज।
पावन उत्सव धरा का,प्रीति भक्ति आगाज़॥

आराधन श्री कृष्ण का, राधा-रानी गान।
गाऍं गीता गान हम, कृष्णचन्द्र वरदान॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥