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ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल

राधा गोयल
नई दिल्ली
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मत इतना सर्वनाश तू कर,
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल
जिनके अपने मर गए यहाँ,
उनको धीरज धर लेने दे
कंधा कोई मिल जाए उन्हें,
सर रख के जरा रो लेने दे।

किसी की महत्वाकांक्षा से,
लाशों का यहाँ अम्बार लगा
समझ नहीं आता किसको,
शत्रु मानें और किसे सगा
रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन दाग,
कितना विनाश कर डाला है
वातावरण प्रदूषित कर,
जीना मुश्किल कर डाला है।

किसी व्यक्ति की अक्ल पे पर्दा ऐसा पड़ा,
इतना महाविनाश करके
वह अट्टहास कर रहा खड़ा,
वह इतना अड़ियल टट्टू है
अपनी ही बात को मनवाए,
समझदार ने समझाया
लेकिन वो समझ नहीं पाए।

इतना अधिक विनाश देख,
मानवता रोती जार-जार
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल,
कुछ तो अपने मन में विचार
जितना विनाश कर चुका है तू,
उसका विकास कैसे होगा ?
विध्वंस बहुत हो चुका मगर,
निर्माण नया कैसे होगा ?

जो काल के मुख में समा चुके,
क्या उनको जीवित कर सकते!
यदि जीवन नहीं दे सकते तो,
फिर उन्हें मौत क्यों तुम देते ?
माँगों का सिंदूर मिटा,
बच्चों से उनके पिता छीन
कौन सहारा देगा उनको ?
आशाओं की दीप्ति हुई क्षीण।

माँ-बहनों के सुत भाई मरे,
बूढ़ों की लाठी टूट गई
दु:ख के इतने काँटे हैं कि,
सब खुशियाँ उनसे रूठ गईं
लाखों लोग मर चुके हैं,
कौन बने उनका सम्बल ?
बहुत विनाश हो चुका है।
अब इस पर जरा लगा सांकल,
ऐ वक़्त जरा तू धीरे चल॥