कुल पृष्ठ दर्शन : 1

उपवास, दिनचर्या और खान-पान में समन्वय आवश्यक

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

*************************************************

नवरात्र भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पावन और आध्यात्मिक पर्व है, जो आत्मशुद्धि, साधना और संयम का संदेश देता है। यह केवल देवी आराधना का ही अवसर नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन स्थापित करने का भी एक श्रेष्ठ माध्यम है। इन नौ दिनों में उपवास, दिनचर्या और खान-पान के बीच उचित समन्वय अत्यंत आवश्यक है, ताकि साधना के साथ स्वास्थ्य भी सुदृढ़ बना रहे।
उपवास का मूल उद्देश्य केवल अन्न त्यागना नहीं, बल्कि इन्द्रियों का संयम और मन की एकाग्रता है। ‘उपवास’ का शाब्दिक अर्थ है-ईश्वर के निकट रहना। अतः, इस अवधि में व्यक्ति को नकारात्मक विचारों, क्रोध, लोभ और अहंकार से दूर रहकर सकारात्मक ऊर्जा का संचय करना चाहिए।
दिनचर्या का समुचित निर्धारण नवरात्र में विशेष महत्त्व रखता है। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान, ध्यान और पूजा करना मन को शुद्ध और स्थिर बनाता है। नियमित रूप से दुर्गा सप्तशती, चालीसा या मंत्रों का पाठ मानसिक शांति प्रदान करता है, साथ ही पर्याप्त विश्राम और हल्की दिनचर्या अपनाना भी आवश्यक है, ताकि शरीर पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
खान-पान में संतुलन नवरात्र के उपवास का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। प्रायः लोग उपवास को केवल फलाहार तक सीमित कर देते हैं, किंतु संतुलित आहार लेना भी उतना ही आवश्यक है। तले-भुने और अत्यधिक मीठे पदार्थों से बचना चाहिए, क्योंकि इससे भारीपन और थकान बढ़ सकती है। नवरात्र में सात्त्विक भोजन का विशेष महत्त्व है। यह न केवल शरीर को हल्का और ऊर्जावान बनाए रखता है, बल्कि मन को भी शुद्ध और शांत करता है।

उपवास, दिनचर्या और खान-पान के बीच संतुलन बनाए रखने से नवरात्र का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है। यह पर्व हमें आत्मसंयम, अनुशासन और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यदि इन तीनों पक्षों का समुचित समन्वय किया जाए, तो नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर, शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक उन्नति का उत्सव बन जाता है। इन पावन दिनों में संयमित उपवास, व्यवस्थित दिनचर्या और संतुलित खान-पान अपनाकर हम न केवल देवी की कृपा प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि जीवन को भी अधिक स्वस्थ, संतुलित और सार्थक बना सकते हैं।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥