डॉ. शैलेश शुक्ला
बेल्लारी (कर्नाटक)
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समय की संध्या और सुबह के संगम पर खड़ा आधुनिक मनुष्य एक ऐसे युग का साक्षी है, जहाँ संवाद की सरिता अब शब्दों से अधिक संकेतों, स्पर्शों से अधिक पर्दे (स्क्रीन) और संवेदनाओं से अधिक सॉफ्टवेयर के सहारे बह रही है। ‘कृत्रिम मेधा’ ने न केवल कार्य और व्यापार की दुनिया को बदला है, बल्कि उसने मनुष्य के सबसे निजी, सबसे नाजुक और सबसे गहरे क्षेत्र – मानवीय रिश्तों को भी प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया है। आज प्रश्न यह नहीं रह गया है, कि ‘कृत्रिम मेधा’ हमारे जीवन में प्रवेश कर चुकी है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह हमारे हृदय, हमारी भावनाओं और हमारे रिश्तों की संरचना को भी परिवर्तित कर रही है।
यदि इस प्रश्न का उत्तर प्रमाणिक तथ्यों और शोध के आधार पर खोजा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह परिवर्तन केवल संभावित नहीं, बल्कि प्रारंभिक स्तर पर वास्तविक भी है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की वर्ष २०२५ की मानव विकास रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कृत्रिम मेधा के युग में तकनीक स्वयं भविष्य को निर्धारित नहीं करती, बल्कि मनुष्य के चयन और व्यवहार यह तय करते हैं कि तकनीक का प्रभाव समाज और संबंधों पर कैसा पड़ेगा। यह कथन इस पूरे विमर्श का आधार बनता है, क्योंकि यह संकेत देता है कि ‘कृत्रिम मेधा’ और मानवीय रिश्तों का संबंध तकनीक से अधिक मानवीय उपयोग और निर्भरता पर आधारित है।
कृत्रिम मेधा के कारण संवाद की प्रकृति में जो परिवर्तन आया है, वह बहुआयामी है। एक ओर यह संवाद को सरल, सुलभ और सर्वव्यापी बना रहा है, दूसरी ओर यह संवाद को सतही, संरचित और कभी-कभी संवेदनहीन भी बना रहा है। यूनेस्को की वर्ष २०२५ की सांस्कृतिक रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया है कि कृत्रिम मेधा (एआई) न केवल संचार के माध्यमों को बदल रही है, बल्कि यह सांस्कृतिक व्यवहार और सामाजिक संबंधों की संरचना को भी प्रभावित कर रही है। इसका अर्थ यह है कि ‘कृत्रिम मेधा’ का प्रभाव सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी है।
आज के समय में ‘कृत्रिम मेधा’ आधारित संवाद माध्यम, जैसे- चैटबॉट, वर्चुअल सहायक और एआई साथी लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं। एक अध्ययन में यह पाया गया कि लगभग २६ प्रतिशत युवा वयस्कों का मानना है कि ‘कृत्रिम मेधा’ भविष्य में वास्तविक रोमांटिक संबंधों का स्थान ले सकती है। यह आँकड़ा केवल एक संभावना नहीं, बल्कि मानसिक परिवर्तन का संकेत है, जहाँ मनुष्य मशीन के साथ भावनात्मक संबंध स्थापित करने की कल्पना करने लगा है।
युवा पीढ़ी में यह प्रवृत्ति और भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। विभिन्न सर्वेक्षणों में यह पाया गया है कि लगभग ७० प्रतिशत से अधिक किशोर किसी न किसी रूप में ‘कृत्रिम मेधा’ साथी का उपयोग कर चुके हैं, और उनमें से एक बड़ा वर्ग इनसे नियमित संवाद करता है। यह स्थिति इस बात का संकेत है, कि ‘कृत्रिम मेधा’ अब सामाजिक साथी के रूप में उभर रही है, किन्तु इस परिवर्तन के साथ जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न हो रहे हैं, वे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक अध्ययन, जिसमें हजारों उपयोगकर्ताओं के व्यवहार का विश्लेषण किया गया, यह दर्शाता है कि जो लोग ‘कृत्रिम मेधा’ चैटबॉट्स के साथ अधिक समय बिताते हैं, उनमें अकेलेपन और भावनात्मक निर्भरता की प्रवृत्ति अधिक पाई गई। यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि ‘कृत्रिम मेधा’ संवाद कभी-कभी वास्तविक मानवीय संबंधों का विकल्प बनने के बजाय उनके स्थान पर एक कृत्रिम सहारा बन सकता है।
मनोवैज्ञानिक शोधों में यह पाया गया है कि ‘कृत्रिम मेधा’ के साथ संवाद करते समय लोग उसी प्रकार की भावनात्मक प्रतिक्रिया विकसित करते हैं, जैसी वे मानव संबंधों में करते हैं। एक अकादमिक अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि लोग ‘कृत्रिम मेधा’ चैटबॉट्स के साथ बात करते समय भावनात्मक समन्वय और लगाव का अनुभव करते हैं, जो वास्तविक संबंधों के समान प्रतीत होता है, किंतु वह स्थायी और पोषक नहीं होता। यह स्थिति ‘कृत्रिम निकटता’ का निर्माण करती है, जो वास्तविक संबंधों की गहराई का स्थान नहीं ले सकती।
यही वह बिंदु है, जहाँ यह प्रश्न गंभीर हो जाता है कि क्या ‘कृत्रिम मेधा’ संवाद हमारी भावनाओं को बदल रहा है। यदि हम इस प्रश्न को गहराई से समझें, तो स्पष्ट होता है कि ‘कृत्रिम मेधा’ संवाद भावनाओं को समाप्त नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें पुनर्गठित कर रहा है। यह उन्हें सरल, त्वरित और नियंत्रित बना रहा है, किंतु साथ ही उनकी स्वाभाविक जटिलता और गहराई को भी सीमित कर रहा है।
‘कृत्रिम मेधा’ संवाद की एक विशेषता यह है कि वह हमेशा उपलब्ध, हमेशा सहमत और हमेशा सहयोगी होता है। यह मनुष्य को एक ऐसा अनुभव प्रदान करता है, जहाँ उसे विरोध, असहमति या अस्वीकार का सामना नहीं करना पड़ता, परंतु यही विशेषता मानवीय संबंधों के लिए चुनौती बन सकती है, क्योंकि वास्तविक रिश्तों की सुंदरता और स्थायित्व इसी विविधता, संघर्ष और संवाद में निहित होता है। यदि मनुष्य ‘कृत्रिम मेधा’ के साथ अधिक सहज और मानव के साथ अधिक असहज होने लगे, तो यह सामाजिक संरचना के लिए गंभीर संकेत हो सकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है सामाजिक कौशल का विकास। किशोरों और युवाओं पर किए गए अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग ‘कृत्रिम मेधा’ साथी के साथ अधिक समय बिताते हैं, उनमें वास्तविक सामाजिक कौशल विकसित होने की संभावना कम हो सकती है, क्योंकि वे संवाद की जटिलताओं का सामना नहीं कर पाते। यह स्थिति भविष्य में सामाजिक अलगाव और भावनात्मक असंतुलन का कारण बन सकती है।
इसके विपरीत ‘कृत्रिम मेधा’ संवाद के कुछ सकारात्मक पक्ष भी हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एआई आधारित चैटबॉट्स का उपयोग बढ़ रहा है, जो लोगों को तत्काल सहायता और संवाद प्रदान करते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ‘कृत्रिम मेधा’ अकेलेपन को कम करने और संवाद कौशल को विकसित करने में सहायक हो सकती है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो सामाजिक रूप से अलग-थलग हैं। यह दृष्टिकोण इस तकनीक के संभावित लाभों को भी रेखांकित करता है।
‘यूनेस्को’ की ‘कृत्रिम मेधा’ नैतिकता संबंधी सिफारिशों में यह स्पष्ट किया गया है कि ‘कृत्रिम मेधा’ का विकास और उपयोग मानव गरिमा, अधिकारों और सामाजिक समरसता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यह सिद्धांत इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंक यह याद दिलाता है कि तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को समृद्ध करना है, न कि उसे प्रतिस्थापित करना।
आज के समय में यह भी देखा जा रहा है कि ‘कृत्रिम मेधा’ के साथ संवाद करते हुए लोग अपनी निजी जानकारी, भावनाएँ और विचार अधिक सहजता से साझा करते हैं। यह प्रवृत्ति एक ओर आत्म-अभिव्यक्ति को बढ़ावा देती है, दूसरी ओर निजता-डेटा सुरक्षा के लिए खतरा भी उत्पन्न करती है। यदि यह जानकारी सुरक्षित नहीं रहती, तो यह व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकती है।
यह कहा जा सकता है कि ‘कृत्रिम मेधा’ और मानवीय रिश्तों के बीच संबंध जटिल, गतिशील और बहुआयामी है। यह न तो पूर्णतः सकारात्मक है और न ही पूर्णतः नकारात्मक। यह एक ऐसा संक्रमण काल है, जहाँ मानव और मशीन के बीच संवाद की नई संरचना विकसित हो रही है। यह संरचना हमारे भावनात्मक व्यवहार, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रभावित कर रही है।
समय की सशक्त सीख यही है कि हमें तकनीक को साधन के रूप में उपयोग करना चाहिए, साध्य के रूप में नहीं। यदि ‘कृत्रिम मेधा’ संवाद मानवीय संबंधों की पूरक बने, तो यह हमारे जीवन को समृद्ध कर सकती है, परंतु यदि उनकी प्रतिस्थापन बन जाए, तो यह भावनाओं की गहराई और रिश्तों की वास्तविकता को कमजोर कर सकती है। अतः, आवश्यक है कि हम ‘कृत्रिम मेधा’ के इस युग में संतुलन, संवेदनशीलता और सजगता के साथ आगे बढ़ें। यही संतुलन भविष्य के स्वस्थ, सशक्त और संवेदनशील समाज की आधारशिला बनेगा।