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घर-आँगन सुरभित हो जाए

ममता तिवारी ‘ममता’
जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)
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बूंदें पड़ी सुहाना मौसम,
सुमन कली मुखरित हो जाए
सौंधी गंध लिए आ जाओ,
घर-आँगन सुरभित हो जाए…।

व्याप रहा गहरा कर विरहा,
उत्साह छिपा नीर बहाए
निर्विकार निश्छल हिया में,
तेरी आकृति उभरा जाए
मीत गया क्यों छोड़ अकेली,
विरह से बावरी कुम्हलाए…।
घर-आँगन सुरभित हो जाए…

अंचल उड़ा-उड़ा ले जाए,
शीतल पवन झकोरे चलते
सुनो पिया यह भय अनजाने,
तुझे देख विचलित हो जाए
जियरा डरे-डरे रहते जो,
तुम आओ तब ही यह जाए
घर-आँगन सुरभित हो जाए…।

समझा दो बरसे ना बादर,
बैरी पवन आए न अंगना
वह अपनी बूंदें छुपा रखे,
बज उठते निगोड़े कंगना।
इन गलियों आने से पहले,
कह देना विपरित हो जाए॥
घर-आँगन सुरभित हो जाए…

परिचय–ममता तिवारी का जन्म १अक्टूबर १९६८ को हुआ है। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्थित बी.डी. महन्त उपनगर (जिला जांजगीर-चाम्पा)में निवासरत हैं। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती तिवारी एम.ए. तक शिक्षित होकर समाज में जिलाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य(कविता ,छंद,ग़ज़ल) है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। पुरस्कार की बात की जाए तो प्रांतीय समाज सम्मेलन में सम्मान,ऑनलाइन स्पर्धाओं में प्रशस्ति-पत्र आदि हासिल किए हैं। ममता तिवारी की लेखनी का उद्देश्य अपने समय का सदुपयोग और लेखन शौक को पूरा करना है।