दिल्ली
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भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता, जनविश्वास और राजनीतिक संस्कृति की परीक्षा भी होते हैं। जब किसी राज्य या क्षेत्र में चुनाव की घोषणा होती है, तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो जाती हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है और दल अपने-अपने एजेंडे को लेकर जनता के बीच पहुंचते हैं, किंतु इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में एक संस्था की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है-भारत का चुनाव आयोग। यही संस्था सुनिश्चित करती है, कि चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और हिंसा-मुक्त वातावरण में सम्पन्न हों। इस बार असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे ४ बड़े राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही देश की राजनीतिक सरगर्मियाँ तेज हो गई हैं। इन पांचों स्थानों की कुल ८२४ विधानसभा सीटों पर मतदान होना है और देश के १७.४ करोड़ मतदाताओं के मन की जानकारी भी मिलेगी। इन चुनावों की ओर पूरे देश की निगाहें लगी हुई हैं, क्योंकि इनके परिणाम केवल इन राज्यों की राजनीति ही नहीं ; बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित कर सकते हैं। इन चुनावों का महत्व केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य की भी परीक्षा है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में लम्बे समय से राजनीतिक संघर्ष और टकराव की स्थिति देखने को मिलती रही है। वहाँ सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के बीच तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है। इस प्रतिस्पर्धा के कारण कई बार चुनावी हिंसा और राजनीतिक तनाव की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। इसलिए यह चुनाव एक कसौटी है, कि क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया हिंसा और भय से मुक्त रहकर हो सकती है।
लोकतंत्र का मूल आधार यह है, कि प्रत्येक मतदाता बिना किसी दबाव, भय या प्रलोभन के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके। भारत जैसे विशाल और विविधता पूर्ण देश में इस आदर्श को बनाए रखना आसान नहीं है। चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे।
इन चुनावों के संदर्भ में पश्चिम बंगाल विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस बार वहाँ सत्ता परिवर्तन की सम्भावना के कारण राजनीतिक संघर्ष और तीखा हो सकता है। सत्तारूढ़ नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करने वाली ममता बनर्जी की सरकार के सामने सत्ता बनाए रखने की चुनौती है, वहीं विपक्ष अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। इस परिस्थिति में आयोग की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, कि वह मतदान प्रक्रिया को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण बनाए रखे। दूसरी ओर केरल और तमिलनाडु की राजनीति भी अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण चर्चा में रहती है। केरल में आमतौर पर सत्ता २ प्रमुख राजनीतिक मोर्चों के बीच बदलती रही है, जबकि तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रीय दलों के प्रभाव के लिए जानी जाती है। इन राज्यों में चुनावी प्रतिस्पर्धा तीव्र होती है, किंतु अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण वातावरण में मतदान की परम्परा भी देखने को मिलती है।
असम की स्थिति भी अलग है, जहां पूर्वाेत्तर भारत की राजनीति के संदर्भ में चुनाव के परिणाम महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि वहाँ सत्तारूढ़ दल फिर से सत्ता में लौटता है, तो यह क्षेत्रीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाएगा।
हालांकि, इन सभी चुनावों के संदर्भ में एक प्रश्न लगातार उठता है कि क्या राजनीतिक दल लोकतंत्र की मर्यादाओं का पालन करने के लिए पर्याप्त गम्भीर हैं। चुनावी राजनीति में प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, किंतु जब यह प्रतिस्पर्धा हिंसा, घृणा और असहिष्णुता में बदल जाती है तो लोकतंत्र की मूल भावना को चोट पहुंचती है। दुर्भाग्य से कई बार राजनीतिक दल चुनाव जीतने की होड़ में लोकतांत्रिक शालीनता को नजरअंदाज कर देते हैं। आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत हमले और हिंसक घटनाएं इस प्रवृत्ति के उदाहरण हैं। इस स्थिति में यह केवल आयोग की जिम्मेदारी नहीं रह जाती, कि वह चुनाव को निष्पक्ष बनाए। राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की भी उतनी ही जिम्मेदारी है, कि वे लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखें। यदि दल स्वयं ही आचार संहिता का सम्मान करें और कार्यकर्ताओं को संयमित आचरण के लिए प्रेरित करें तो चुनावी प्रक्रिया अधिक स्वस्थ और सकारात्मक बन सकती है। लोकतंत्र की सफलता केवल संस्थाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक चेतना पर भी निर्भर करती है। इसके साथ ही मतदाताओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में यदि मतदाता जागरूक और सजग हों तो वे ऐसे नेताओं और दलों को प्रोत्साहित करेंगे, जो लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हैं। मतदाताओं को यह समझना होगा कि उनका मत केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की दिशा तय करने वाला निर्णय भी है। इन ५ क्षेत्रों में होने वाले चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे यह संदेश देंगे कि भारत का लोकतंत्र किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि ये चुनाव शांतिपूर्ण होते हैं तो यह न केवल देश के लिए, बल्कि दुनिया के लिए भी एक सकारात्मक उदाहरण होगा।
प्रश्न यह है कि क्या हम इन चुनावों के माध्यम से एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर पाएंगे, जिसमें लोकतंत्र केवल मतपेटियों तक सीमित न रहकर शालीनता, सहिष्णुता और जनविश्वास की भावना को भी मजबूत करे। यही वह कसौटी है, जिस पर चुनावों की सफलता या असफलता का वास्तविक मूल्यांकन किया जाएगा।