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जीवन की अविरल धारा तुम प्रिये

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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जीवन की अविरल धारा तुम प्रिये, हर पल मन को महकाती हो,
सूने सपनों मरुस्थल में, सावन बनकर बरसाती हो
सौम्यता, गरिमा, ममतामयी, लज्जा श्रद्धा, करुण पहचान,
हर रिश्ते में नव जीवन की, प्रिये मधुर सुवास बसाती हो।

निशि! मंद मुस्कान तुम्हारी, दु:ख की छाया हर लेती हो,
स्नेह-सुधा की फुहारें शीतल, हिय हर पीड़ा हर लेती हो
विश्वास, समर्पण, अपनापन, दिया सजन अनुराग, सम्मान,
दम्पती जीवन स्वर्ण-प्रभा से, नूतन सम्प्रीति सजाती हो।

सुख-दुःख की हर धूप-छाँह में, संग-संग चलती जाती हो,
हर अँधियारे की चौखट पर, बन ज्योति दीप जल जाती हो
धैर्य, साहस, संयम, साधना, सेवा, नित सत्प्रेरक चरित्र विधान,
जीवन के हर कठिन क्षण को, तुम सहज सरल कर जाती हो।

विरह रेखा जब उभरे आँखों, मौन कहानी कह जाती हो,
मौन पलों की करुण पुकारें, अंतस गहरी सह जाती हो
तृष्णा, पीड़ा, वेदन, चाहत, दफनाती, आकांक्षा, अरमान,
प्रेम-सुधा की एक बूँद में, सबको विलीन कर देती हो।

निशि! तेरा स्नेह-सान्निध्य रस, जीवन माधुर्य बनायी हो,
हर साँस में बसी तुम्हारी, ममता का विस्तार करायी हो।
श्रद्धा, प्रज्ञा, शील, विवेक मति, चारु प्रकृति-सौन्दर्य, सम्मान,
मेरे हर अस्तित्व बसी तुम, मेरा सुख संसार बनायी हो।

आज तुम्हारे जन्मदिन पर, दिल प्रीत सुमन बरसाता हूँ,
छन्द-छन्द में संंजीवन रस, प्रिय स्नेहाशीष सजाता हूँ।
दीर्घायु, सारोग्य, कीर्ति सुख, मंगलमय अनमोल संसार,
ईश्वर से बस यही प्रार्थना, अधरों मुस्कान सजाता हूँ॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥