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डराने लगी है आभासी खेल की लत

ललित गर्ग

दिल्ली
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आभासी खेल (ऑनलाइन गेमिंग) की लत एवं दुनिया कितनी भयावह व घातक हो सकती है, इसकी एक ही दिन में २ अलग-अलग जगह घटी घटनाओं ने न केवल झकझोरा है, बल्कि यह हमारे समय, हमारी सामाजिक संरचना और सामूहिक असावधानी पर लगा हुआ एक गहरा प्रश्नचिह्न बना है। धीरे-धीरे किशोरवय को अपने चपेट में लेने वाली यह प्रवृत्ति कितनी हृदयविदारक हो सकती है, उसका उदाहरण ये २ भयावह घटनाएं हैं। एक हृदयविदारक घटना में गाजियाबाद की ३ अल्पवयस्क बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में १२,१४ और १६ साल की ३ सुकोमल बहनें असमय काल-कवलित हो गईं। आभासी कोरियन गेम की दीवानी बहनें कोरिया में जाकर बसने और वहीं नया जीवन शुरू करने का सपना देखती थीं। घर वालों ने जब उनकी सनक से परेशान होकर उनसे मोबाइल छीन लिए, तो वे अवसाद में घिर गई। फिर तीनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। ऐसी ही घटना हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी घटी, जहां एक पंद्रह वर्षीय किशोर ने आभासी खेल के अपने एक विदेशी साथी के बिछुड़ने के गम में घर में आत्महत्या कर ली। इन घटनाओें ने समाज को स्तब्ध ही नहीं किया, बल्कि भीतर तक गहरा घाव दिया है। यह कोई आकस्मिक या अलग-थलग घटना नहीं है। इससे पहले झाबुआ, भोपाल और देश के अन्य हिस्सों में सामने आई ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि आभासी दुनिया किस तरह वास्तविक जीवन पर हावी होती जा रही है और हम अनजाने में एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहां संवेदनाएं, संवाद और जीवन-मूल्य पर्दे के पीछे दम तोड़ते जा रहे हैं।
आभासी खेल अपने-आपमें अपराध नहीं है, न ही तकनीक शत्रु है, लेकिन जब यह बच्चों के लिए लत बन जाए, तो यह धीमा जहर बन जाती है। यह जहर चुपचाप बच्चों के मस्तिष्क में प्रवेश करता है, उनकी सोच, उनकी भावनात्मक संरचना और उनके निर्णय लेने की क्षमता को विकृत करता है। खेल की दुनिया बच्चों को तात्कालिक रोमांच, आभासी जीत और काल्पनिक पहचान देती है, लेकिन धीरे-धीरे वही दुनिया उन्हें वास्तविक जीवन से काट देती है। परिवार, मित्र, पढ़ाई, प्रकृति, खेल और संवाद-सब कुछ पीछे छूटने लगता है। तीनों बहनों का यह कदम इसी कटाव का चरम और भयावह परिणाम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक आभासी खेल बच्चों के मस्तिष्क में आवेग नियंत्रण को कमजोर करते हैं। जोखिम का आकलन करने की क्षमता घटती है और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है। हार, असफलता या खेल से वंचित किए जाने की स्थिति में अवसाद, क्रोध और निराशा गहराने लगती है। कई बार बच्चे आत्महत्या जैसे चरम कदम को भी एक ‘खेल समाप्त’ की तरह देखने लगते हैं। यह सोच और आत्महत्या की प्रवृत्ति का बढ़ना केवल मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक चुनौती है, जो हमारी परवरिश, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी नीतियों पर सवाल है।
आज के परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता, एकल परिवारों की बढ़ती संख्या और संवाद की कमी ने बच्चों को अकेलेपन की ओर धकेला है। स्मार्ट फोन कई घरों में बच्चों की चुप्पी खरीदने का सबसे आसान साधन बन गया है। रोता बच्चा हो, जिद करता बच्चा हो या समय न देने की मजबूरी-मोबाइल फोन एक त्वरित समाधान बन चुका है, लेकिन यही समाधान आगे सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। हम भूल जाते हैं कि बच्चा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मार्गदर्शन, स्नेह और समय चाहता है। जब यह सब उसे पर्दे (स्क्रीन) से मिलने लगता है, तो परिवार की भूमिका स्वतः कमजोर हो जाती है। यह भी एक कठोर सत्य है कि कई माता-पिता स्वयं डिजिटल लत के शिकार हैं। ऐसे में बच्चों को रोकने का नैतिक और व्यवहारिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाता है। हम बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे मोबाइल कम चलाएं, जबकि हमारे अपने हाथों में हर समय रहता है। यह दोहरा व्यवहार बच्चों के मन में भ्रम और विद्रोह दोनों पैदा करता है। इसलिए समस्या का समाधान केवल बच्चों पर नियंत्रण नहीं, बल्कि पूरे पारिवारिक वातावरण में संतुलन लाने से जुड़ा है।
सरकार और समाज की भूमिका भी इस संकट में कम महत्वपूर्ण नहीं है।आभासी खेल उद्योग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन उसके सामाजिक प्रभावों पर पर्याप्त नियंत्रण और निगरानी का अभाव है। बच्चों के लिए आयु-उपयुक्त सामग्री, समय-सीमा और चेतावनी संकेतों को सख्ती से लागू करना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। सरकार को चाहिए कि वह इसके लिए स्पष्ट और कठोर नियामक ढाँचा विकसित करे, जिसमें बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि हो।
इसमें विद्यालयों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रह सकती। डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन-कौशल को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, न कि तकनीक के गुलाम कैसे बना जाए। यदि किसी बच्चे में अवसाद, अत्यधिक चुप्पी, आक्रामकता या आत्मघाती विचारों के संकेत दिखें, तो समय रहते विशेषज्ञ की मदद लेना अत्यंत आवश्यक है। निश्चित रूप से आत्मघात की ये घटनाएं हमारे नीति-नियंताओं और अभिभावकों को आसन्न संकट के प्रति सचेत करती हैं। हालांकि, समाज विज्ञानी इस बात पर भी बल देते हैं कि केवल खेल या आभासी मित्रता ही आत्महत्या का कारण नहीं बन सकती हैं। निस्संदेह, आत्महत्या एक जटिल और बहुआयामी घटना है, लेकिन समस्याग्रस्त डिजिटल जुड़ाव, विशेष रूप से जब यह भौतिक जीवन से अलगाव, बाधित शिक्षा और तीव्र भावनात्मक तनाव के साथ होता है तो संवेदनशील युवा के मन में परेशानी को और बढ़ा सकता है।
यह घटनाएं यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि हमने बच्चों के लिए कैसी दुनिया बनाई है। क्या हमने उन्हें संवाद दिया, या केवल उपकरण थमा दिए ? क्या हमने उन्हें संस्कार दिए, या केवल सुविधाएं ? पूरे समाज को अपने भीतर झांककर देखना होगा। यह घटना एक चेतावनी है, यदि अब भी इसे एक सामान्य समाचार की तरह भुला दिया, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। समाज को, सरकार को और प्रत्येक परिवार को मिलकर कड़े और संवेदनशील कदम उठाने होंगे। यह समय है जागने का, सोचने का और ठोस कदम उठाने का।