कुल पृष्ठ दर्शन : 2

नन्हीं आवाज़

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

*************************************************

सुबह का उजास अभी ठीक से उतरा भी नहीं था, कि बस-स्टैंड के कोने में बैठी गुड़िया ने कूड़े के ढेर से कागज़ बटोरना शुरू कर दिया। उसके हाथों में काँटे चुभते, पर आँखों में दर्द से बड़ी एक जिद चमकती-आज स्कूल के सामने वाले चायवाले से उसे २ सूखी रोटियाँ मिल जातीं, तो माँ के लिए बचा पाएगी। माँ रात की सफाई कर लौटी थी; बुख़ार में तपती देह को वह गुड़िया की हँसी से ही सहलाती थी।
स्कूल की घंटी बजी। गुड़िया के पाँव ठिठक गए। खिड़की से झाँकती कक्षा में बच्चे स्लेट पर अक्षर बना रहे थे। उसकी उँगलियाँ हवा में वही अक्षर लिखने लगीं-क, ख, ग… जैसे कोई भूखी चिड़िया दानों का सपना देख रही हो। तभी चौकीदार की डाँट गूँजी, “यहाँ मत खड़ी रहो!” गुड़िया ने नज़रें झुका लीं। शब्द गले में अटक गए। उसे बोलना आता था, माँ से बातें करती थी-पर दुनिया के सामने उसकी आवाज़ पतली पड़ जाती।
दोपहर को माँ की दवा ख़त्म हो गई। गुड़िया ने अपनी छोटी-सी थैली खोली-आज के बटोरे सिक्के पूरे नहीं थे। उसने मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर रोना चाहा, पर रोना भी काम में बाधा बनता है;यह बात उसने बहुत जल्दी सीख ली थी। तभी पास से एक शिक्षक गुज़रे। उन्होंने गुड़िया की हथेलियों में चुभे काँटे देखे, आँखों में रुकी नमी देखी। बिना सवाल किए अपने टिफ़िन से रोटी निकालकर दी और पूछा, “पढ़ोगी ?”

उस दिन गुड़िया पहली बार ‘हाँ’ बोल पाई। शिक्षक ने स्कूल में नाम लिखवाया, किताबें दिलाईं, माँ की दवा की व्यवस्था करवाई। महीनों बाद गुड़िया की उँगलियाँ हवा में नहीं, कागज़ पर अक्षर बनाने लगीं। उसकी सिसकियाँ धीमी पड़ गईं-दर्द पूरी तरह गया नहीं, पर उम्मीद ने उसे बोलना सिखा दिया।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥