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नश्वरता

सीमा जैन ‘निसर्ग’
खड़गपुर (प.बंगाल)
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फिर एक कविता आकार लेने लगी है,
भीगे शब्दों के वसन धारण करने लगी है
वो जो पड़ा है जमीं पर… निर्विकल्प-सा,
उसकी सौहार्द्रता का गुणगान करने लगी है
फिर से एक कविता आकार लेने लगी है।

घटनाएँ खास वाली, बताई जा रही है,
उसकी पूरी ज़िंदगी, गुनगुनाई जा रही है
अजनबियों को यादगार किस्से कहकर,
ज़िंदगी-भर की निंदाएं छिपाई जा रही है
फिर एक कविता आकार में आ रही है।

भीगी आँखें नश्वरता को देख रही है,
चुपके से अपने मन को टटोल रही है
शायद फिर कोई वादा, खुद से करके,
मन का मैला गलियारा, साफ कर रही है
फिर एक कविता आकार ले रही है।

जाने कब तक, ये वादा निभाया जाएगा,
बाहर धरते ही कदम, दलदल में घुस जाएगा
फिर से दुनिया का आकर्षण, बहुत लुभाएगा,
भावनाओं का स्वार्थी समंदर, यूँ सूख जाएगा
फिर एक कविता का आकार रूठ जाएगा।

नश्वर-तन श्मशान में पहुंच खाक हो जाएगा,
सच्चा साथी ही कर्म का बोझ उठाएगा
जैसा चल रहा जीवन, चलता चला जाएगा।
इंसान फिर कान में रुई डाल सो जाएगा,
एक कविता का आकार पूर्ण हो जाएगा॥