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नश्वर काया

श्रीमती देवंती देवी
धनबाद (झारखंड)
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गुमान नहीं करना बन्धु, ये तन माटी की नश्वर काया है,
धर्म से आगे चलती माया, सबको जाल में फंसाया है।

धर्म,सत्य पथ पर अडिग खड़ा है, बिरला समझ पाया,
जो जन माया को अपनाया, वही जनमुक्ति नहीं पाया।

हे मानव जान-बूझकर क्यों, दुष्ट माया के पीछे पड़े हैं।
खोल हृदय का द्वार बन्दे, सन्मुख तेरे धर्मगुरु खड़े हैं।

जहाँ तुमने जन्म लिया, ये जग चला-चली का मेला है,
सभी यहाँ के हैं मुसाफिर, वापस जाने की भी बेला है।

जाना है अगम देश मुसाफिर, गठरी संभाल के बांधना,
पाप-धर्म को तौलेंगे धर्मराज, पड़े नहीं तुझे पछताना।

पगड़ी बांधी, केश संवारा, इतर मल रहा है अंग- अंग में,
दया-धर्म का नाम नहीं है, लेकर जाओगे क्या संग में।

कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी, जितना रतन-धन को कमाया,
धर्म हृदय में नाम मात्र नहीं है, पाप में ही समय बिताया।

जग, पाप-पुण्य का मेला है मितवा, यहाँ घूमने आए हैं,
रिश्ता-नाता अपना नहीं है, ये सब प्रभुजी की माया है।

ईश्वर ने बनाई माटी की कंचन काया, फिर माटी में मिलाया है,
यह नश्वर काया है, ईश्वर का संदेश कविता में समझाया है॥

परिचय– श्रीमती देवंती देवी का ताल्लुक वर्तमान में स्थाई रुप से झारखण्ड से है,पर जन्म बिहार राज्य में हुआ है। २ अक्टूबर को संसार में आई धनबाद वासी श्रीमती देवंती देवी को हिन्दी-भोजपुरी भाषा का ज्ञान है। मैट्रिक तक शिक्षित होकर सामाजिक कार्यों में सतत सक्रिय हैं। आपने अनेक गाँवों में जाकर महिलाओं को प्रशिक्षण दिया है। दहेज प्रथा रोकने के लिए उसके विरोध में जनसंपर्क करते हुए बहुत जगह प्रौढ़ शिक्षा दी। अनेक महिलाओं को शिक्षित कर चुकी देवंती देवी को कविता,दोहा लिखना अति प्रिय है,तो गीत गाना भी अति प्रिय है |