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परम्परा के रंग में डूब कर तो देखो…

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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होली विशेष…

भारतीय संस्कृति का अनुपम और पावन पर्व होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, वरन दिल की कटुता को भूलकर रिश्तों में मिठास घोलने का सुअवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है, कि जीवन का सौंदर्य बाहरी आडम्बर में नहीं, वरन् संबंधों की मधुरता, मन की निर्मलता और व्यवहार की कोमलता में छिपा हुआ है।
आज की व्यस्त जीवन-शैली में जब हम एक ही घर में रहकर भी भावनात्मक दूरी का अनुभव करते हैं, मोबाइल और सोशल मीडिया के कारण रिश्तों के बीच की आत्मीयता कहीं पीछे छूटती जा रही है, तो ऐसे समय में होली हम सबको अपने गिले-शिकवे मिटाकर गले मिलने का अवसर देती है। यदि हम अपने मन की कटुता त्याग कर सहयोग, सद्भाव और अपनत्व का रंग धारण करें, तो यह पर्व समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।
रंगीन सुवासित जल, फूलों का पराग और गुलाल आदि छिड़कने, सुंदर वस्त्र धारण करने, पकवान खाने-खिलाने और अबीर-गुलाल मस्तक पर लगा कर बड़ों के चरण स्पर्श और बराबर वालों को गले लगाने की परम्परा में होली का उल्लास व्यक्त होता है।
साहित्य और भक्ति-उपासना के संसार में होली की अद्भुत छवियाँ देखने को मिलती हैं। ब्रज बरसाने की लठ मार होली, गीतों-कविताओं में और पारंपरिक होली गायन में शिव-पार्वती की होली के अनेक चित्र जन-मन में व्याप्त है। एक प्रसिद्ध गीत है- ‘गौरी संग लिये शिव शंकर खेलत फाग।’ गिरिजा देवी या शोभा गुर्टू के स्वर में ‘आज बिरज में होरी रे रसिया’ का लोकप्रिय गान, पंडित छन्नूलाल के स्वर में प्रसिद्ध
‘खेलैं मसाने में होरी दिगंबर खेलैं मसामे मां होरी’ विरक्त शिव की इस होली के चित्र के बाद लीला पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण की गोपियों के साथ होली का चित्र अनुपम है। कवि पद्माकर के शब्दों में ‘फाग के अभीरन में गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी‘, भाई करी मन की पद्माकर ऊपर नाइ अबीर की झोरी‘…। ब्रज की होली का प्रभाव इतना व्यापक है कि सर्वाधिक होली गीतों के नायक श्री राधा-माधव ही हैं, परंतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम इस उल्लास में अधिक कमनीय और रसाप्लावित दिखाई देते हैं। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में
‘खेलत वसंत राजाधिराज देखत नभ कौतुक सुर समाज सोहैं सखा अनुज रघुनाथ साथ झोरिन्ह अबीर पिचकारि हाथ‘ में एक पूरी परम्परा श्री सीता राम के फाग राग का विस्तार करती दिखाई पड़ती है।
रसिक उपासना के परमाचार्य होली का गान करते हुए लिखते हैं- ‘जानकी खेलन होरी पिय संग चली
अपने अपने महल से निकली उर सोहैं चम्पाकली‘। आगे लिखते हैं
‘दुहूँ दिशि से रस बरसन लागे कुमकुम छाई गली, राजा दशरथ कौशिल्या झरोखनि दृग सुख लेत भली‘।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की होली का बहुचर्चित गीत आज भी उत्तर भारत में सुनाई पड़ता रहता है-
‘होली खेलैं रघुवीरा अवध मां
रामा के हाथ कनक पिचकारी
सीता के हाथ अबीर झोली।’
रस-रंग-राग का यह उत्सव होली एक ओर हमें अपने अंतर्निहित भावों को व्यक्त करने, रस रूप में जीने के लिए प्रेरित करता है तो दूसरी ओर अपने मन के अवसाद , चिंताओं और एकाकीपन से उबरने का अवसर देता है।