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पुस्तकों से प्रेम बढ़ाएँ

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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आज डिजिटल आपा-धापी के समय में पढ़ने की संस्कृति और पुस्तकों पर छाए हुए संकट की बात अक्सर होती रहती है, परंतु सुखद बात यह है कि आज भी पुस्तकों का अलग ही महत्व है। अंतरजाल के शुरुआती दौर में लोगों ने यह चिंता जताई थी कि सूचना का यह माध्यम पुस्तकों के लिए नुकसानदायक साबित होगा। आज जब डिजिटल पुस्तकालय की अवधारणा जन्म ले चुकी है, तब फिर से पुस्तकों के अस्तित्व पर खतरे की बात की जा रही है। यद्यपि, विदेश में डिजिटल पुस्तकालय का अधिक उपयोग हो रहा है, इसके बावजूद वहाँ पर भी पुस्तकों की लोकप्रियता बरकरार है। ना तो आज पुस्तकों पर कोई संकट है और ना ही भविष्य में रहेगा।
सच में किताबों का साथ दुनिया के श्रेष्ठ अनुभवों से गुजरने जैसा है। प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा ने ठीक ही कहा है “किताबें मन का शौक, दिल का डर या अभाव की हूक कम नहीं करतीं, सिर्फ सबकी आँख बचा कर चुपके से दुखते सिर के नीचे सिरहाना रख देती हैं।”
पुस्तकें हमारी मित्र और हमसफर की तरह से हमसे रिश्ता निभाती हैं, परंतु प्रश्न तो यह है कि क्या हम पुस्तकों के साथ रिश्ता निभा रहे हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है, कि आज भी हम उपहार में किताब देनें की संस्कृति विकसित नहीं कर पाए हैं। सौ ₹ की किताब हमें मंहगी लगने लगती है, परंतु २०० ₹ का पिज्जा हमें कभी महँगा नहीं लगता, मगर हम सबकी इतनी बेरुखी के बाद भी किताबें हमारा पीछा नहीं छोड़ रहीं हैं।
आज अंतरजाल ज्ञान का बहुत बड़ा माध्यम अवश्य बन गया है, परंतु यह किताबों का विकल्प नहीं बन सकता है।
सामान्यतः जब भी किताबों पर संकट की बात होती है, तो हमारी बहस के केंद्र में साहित्यिक किताबें होती हैं, जबकि साहित्य के अतिरिक्त ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों में पुस्तक प्रकाशन की अपार संभावनाएं हैं।
किताबें हमारे आस-पास की दुनिया को समझने और सही गलत के बीच निर्णय लेने में हमारी मदद करती हैं। वे हमारे सार्वकालिक शिक्षक के रूप में हमारे जीवन में शामिल रहती हैं। किताबें पढ़ने से हमारे व्यक्तित्व में गुणात्मक परिवर्तन आता है।
पुस्तकें हमारे लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करती हैं और प्राप्ति में सहायता करती हैं। पुस्तकें पढ़ने से अवांछित तनाव पर काबू पाने में भी मदद मिलती है। ये हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाती है, जिसे हम सुकून की दुनिया कह सकते हैं।
पुस्तकें पढ़ने से ध्यान की एकाग्रता बढ़ती है। रोजाना कुछ देर पढ़ना शब्दावली और भाषा कौशल के निर्माण में भी मददगार होता है। सबसे बड़ी बात है, पुस्तकों के पन्ने पलट कर उसे छूने का सुख ई-बुक्स से कभी नहीं मिल सकता है । वर्तमान परिस्थिति को देखकर किसी ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा है,-
“कागज की ये महक, ये नशा रूठने को है।
किताबों से इश्क करने की ये आखिरी सदी है।”