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बुजुर्ग

ताराचन्द वर्मा ‘डाबला’
अलवर(राजस्थान)
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एक,
अनजान-सी
आहट ने मुझे,
धक्का मारा
मैं दूर गिरा,
उठ न सका
लाचार आँखों से,
देख न सका।

मैंने पूछा,
किसने मारा
मरे हुए को!
वो गुर्राया,
कुछ बड़बड़ाया
मैं पहचान गया था,
अपने को।

मैं कुछ बोल पाता,
उसने फिर से
धक्का मारा,
मैं फिर गिरा
आह, निकली,
कलेजा थर्राया
बेबसी के आँसुओं ने,
खूब रुलाया।

मेरे बुढ़ापे को,
शायद वो
अपनी बेइज्जती,
समझ रहा था
इसलिए मुझे,
कोस रहा था।

एक पल के लिए,
मैं अतीत में खो गया
ये वही है जिसको,
अँगुली पकड़ कर
चलना सिखाया,
काँधों पर झुलाया
और जब गिरा,
ठोकर खाकर
तो सीने से लगाया।

पता नहीं कब तक,
पडा़ रहा था मैं लाचार
वो छोड़ गया था मुझे,
समझ कर बेकार
फिर जब होश आया,
अचानक, एक आवाज आई,
उठ, हिम्मत न हार,
तुम स्वयं हो प्रकाश
मैंने पूछा अब तुम कौन हो भाई!
वो मुस्कराया, बोला-
तुम्हारा आत्मविश्वास॥

परिचय- ताराचंद वर्मा का निवास अलवर (राजस्थान) में है। साहित्यिक क्षेत्र में ‘डाबला’ उपनाम से प्रसिद्ध श्री वर्मा पेशे से शिक्षक हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी,कविताएं एवं आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप सतत लेखन में सक्रिय हैं।

 

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